मध्य प्रदेशराज्‍य

MP में बड़ा फैसला: बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदला, इतिहास और संस्कृति से जुड़ा नया नाम

By Admin|04 Jun 2026, 1:02 PM
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भोपाल 

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बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक में विश्वविद्यालय का नाम बदलकर वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। प्रस्ताव अब अंतिम निर्णय के लिए राज्य शासन को भेजा जाएगा। शासन की स्वीकृति मिलने के बाद ही नाम परिवर्तन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। 

राजा भोज की विरासत का दिया गया हवाला
बैठक में राजा भोज के ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान पर विस्तार से चर्चा हुई। प्रस्ताव के समर्थकों का कहना था कि मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और बौद्धिक विरासत में राजा भोज का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसी आधार पर विश्वविद्यालय को नई पहचान देने की पहल की गई है।

राजा भोज की विरासत का दिया गया हवाला
प्रस्ताव में राजा भोज के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक योगदान का उल्लेख किया गया. प्रस्ताव में कहा गया, 'राजा भोज की तुलना में बरकतउल्ला भोपाली के भोपाल निवासी होने से अधिक इस क्षेत्र के लिए किसी प्रकार का योगदान नजर नहीं आता है'. इसी तर्क के आधार पर विश्वविद्यालय का नाम बदलने की सिफारिश की. प्रस्ताव में ये भी कहा गया कि भोपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को देखते हुए विश्वविद्यालय का नाम "वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय" किया जाना अधिक उपयुक्त होगा। 

कौन थे बरकतउल्ला भोपाली?
बता दें कि मौलाना मोहम्मद बरकतउल्ला भोपाली भोपाल में जन्मे भारत के प्रमुख क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों में से थे. उन्होंने भारत के बाहर रहकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वैश्विक समर्थन दिलाने का प्रयास किया. इसके अलावा गदर आंदोलन से जुड़े और भारतीय क्रांतिकारियों के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बने. वहीं 1927 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में उनका निधन हुआ था। 

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राजा भोज ने लिखे थे 80 ग्रंथ
राजा भोज द्वारा लगभग अस्सी ग्रंथ लिखे गए, जिनमें से 27 ग्रंथ आज भी उपलब्ध है. राजा भोज ने केवल स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, बल्कि अपनी राजधानी धारा (धार) को ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र बनाया था. उन्होंने वहां 'भोजशाला' (सरस्वती मंदिर) की स्थापना की, जो उस दौर का एक महान विश्वविद्यालय था. भोज शाला में उनके द्वारा स्थापित की गई वाग देवी की प्रतिमा जो आज इंग्लैंड के संग्रहालय में रखी गई है. उन्हें विद्या की आराध्य देवी सरस्वती के रूप में 1000 वर्ष तक पूजी गई। 

शासन की मंजूरी के बाद आगे बढ़ेगी प्रक्रिया
विश्वविद्यालय प्रशासन ने बताया कि कार्यपरिषद से प्रस्ताव पारित होने के बाद अब इसे शासन के पास भेजा जाएगा। आवश्यक दस्तावेज और औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं। अंतिम फैसला राज्य सरकार के स्तर पर लिया जाएगा।

अरबी-पर्शियन विभागों का होगा पुनर्गठन
बैठक में शैक्षणिक ढांचे से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले भी लिए गए। इसके तहत अरबी और पर्शियन विभागों को पुनर्गठित कर तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति विभाग के अंतर्गत लाने का निर्णय लिया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि इससे अकादमिक गतिविधियों में बेहतर समन्वय और अध्ययन के नए अवसर विकसित होंगे।

बीएड कॉलेजों पर सख्ती
कार्यपरिषद की बैठक में बीएड कॉलेजों के निरीक्षण में सामने आई अनियमितताओं पर भी चर्चा हुई। करीब 30 कॉलेजों में कमियां मिलने के बाद संबंधित संस्थानों को नोटिस जारी करने का निर्णय लिया गया। प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि नियमों के पालन को लेकर आगे भी सख्ती जारी रहेगी।

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1988 में मिला था 'बरकतउल्लाह' नाम
भोपाल के इस प्रमुख उच्च शिक्षा केंद्र की स्थापना साल 1970 में 'भोपाल विश्वविद्यालय' के रूप में हुई थी। इसके बाद, मौलाना बरकतउल्लाह के देश की आजादी में दिए गए अद्वितीय योगदान को सम्मान देने के लिए साल 1988 में इसका नाम बदलकर 'बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय' किया गया था।

1854     भोपाल में महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना बरकतउल्लाह का जन्म हुआ।
1915     काबुल (अफगानिस्तान) में बनी भारत की पहली अस्थायी सरकार में मौलाना बरकतउल्लाह प्रधानमंत्री बने।
1970     भोपाल में इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की स्थापना 'भोपाल विश्वविद्यालय' के नाम से हुई।
1988     विश्वविद्यालय का नाम बदलकर क्रांतिकारी मौलाना बरकतउल्लाह के नाम पर रखा गया।
2026 (अब)     कार्य परिषद की बैठक में नाम बदलकर 'वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय' करने का प्रस्ताव पास हुआ।

क्या है नए नाम 'वाग्देवी भोजपाल' का मतलब?
विश्वविद्यालय को दिया गया नया नाम 'वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय' इसके ऐतिहासिक और प्राचीन स्वरूप को दर्शाता है। इसमें शामिल 'वाग्देवी' शब्द ज्ञान, कला और बुद्धि की देवी मां सरस्वती का प्रतीक है। वहीं 'भोजपाल' शब्द भोपाल के प्राचीन इतिहास और राजा भोज के काल से सीधा संबंध जोड़ता है।

नाम परिवर्तन पर उठा विरोध का स्वर
बैठक में नाम परिवर्तन के प्रस्ताव का विरोध भी सामने आया। कुछ सदस्यों ने स्वतंत्रता सेनानी बरकतउल्लाह भोपाली के योगदान का हवाला देते हुए विश्वविद्यालय का मौजूदा नाम बरकरार रखने की बात कही। उनका तर्क था कि बरकतउल्लाह भोपाली का स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, इसलिए उनके नाम से जुड़े संस्थान की पहचान कायम रहनी चाहिए। कार्यपरिषद के इस फैसले के बाद विश्वविद्यालय के नाम परिवर्तन को लेकर शैक्षणिक और सामाजिक क्षेत्रों में बहस शुरू हो गई है। अब सभी की नजर राज्य शासन के निर्णय पर टिकी है, जहां इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लगनी है। 

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