राजनांदगांव : बच्चों में धर्म के संस्कार बचपन से डालें, भविष्य संवरेगा…
डोंगरगांव , शांतिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर में चातुर्मास में आयोजित नियमित प्रातःकालीन धर्मसभा में विराजित साध्वी आज्ञांजना जी मसा ने गुरुवार को कहा कि आज की पीढ़ी का धर्म के प्रति रुझान घटता जा रहा है। ऐसे समय में बच्चों को धर्म, संस्कार और जिनवाणी से जोड़ने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी माता-पिता, विशेषकर माताओं की है। बचपन में दिए गए संस्कार ही भविष्य के चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
उन्होंने कहा कि केवल प्रवचन सुन लेना पर्याप्त नहीं है। जब तक जिनवाणी का संदेश हृदय की गहराइयों तक नहीं उतरता और जीवन का हिस्सा नहीं बनता, तब तक आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। धर्म का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब उसे सुनने के साथ-साथ समझा और आचरण में उतारा जाए। उन्होंने ममण सेठ और मगध के राजा श्रेणिक का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि दोनों ने संत-सेवा और धर्मभाव से पुण्य अर्जित किया।
कहा कि दान देने के बाद यदि मन में पश्चाताप या अहंकार का भाव आ जाए, तो पुण्य के साथ पाप का बंध भी हो जाता है। इसलिए प्रत्येक धार्मिक कार्य निष्काम और निर्मल भाव से करना चाहिए। केवल धन-संपत्ति से जीवन सफल नहीं होता, उसके सदुपयोग के लिए पुरुषार्थ और सम्यक दृष्टि भी आवश्यक है। बच्चे कुम्हार की मिट्टी के समान होते हैं, उन्हें जैसा संस्कार मिलेगा, उनका व्यक्तित्व भी वैसा ही निर्मित होगा।
आत्मशुद्धि की दिशा में प्रयास करना चाहिए मसा ने श्रद्धा के पांच आधार निसर्ग, उपदेश, बीज, संज्ञा और आज्ञा का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका सही ज्ञान व्यक्ति को धर्ममार्ग पर दृढ़ बनाता है। वहीं मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग जैसे कारण जीव को कर्मबंधन में बांधकर आत्मोन्नति से दूर कर देते हैं। बताया कि कर्मबंध आठ प्रकार के होते हैं, जिनमें चार घाति कर्म आत्मा के गुणों को ढकते हैं, जबकि शेष कर्मों की प्रकृति भिन्न होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को शुभ कर्मों का संचय कर आत्मशुद्धि की दिशा में निरंतर प्रयास करना चाहिए।
