
राजनांदगांव : डेढ़ साल में 7.5 करोड़ की देवकट्टा-बेलगांव नहर लाइनिंग हुई जर्जर, गुणवत्ता पर सवाल…
डोंगरगढ़ , डोंगरगढ़ क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं को मजबूत बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई देवकट्टा जलाशय से बेलगांव तक लगभग 7 किलोमीटर लंबी नहर परियोजना निर्माण के महज डेढ़ वर्ष के भीतर ही गंभीर तकनीकी खामियों और कथित लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। वर्ष 2022-23 के बजट में स्वीकृत इस परियोजना पर लगभग 7.5 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। विभागीय स्तर पर इसे वर्ष 2024 के मानसून पूर्व पूर्ण बताया गया था, लेकिन वर्तमान स्थिति निर्माण गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
स्थानीय स्तर पर किए गए निरीक्षण में सामने आया है कि नहर के कई हिस्सों में कंक्रीट लाइनिंग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है। विशेष रूप से करीब 2 किलोमीटर क्षेत्र में नहर की स्थिति इतनी खराब हो गई है कि वह सिंचाई नहर के बजाय सामान्य नाली जैसी दिखाई देती है। कई स्थानों पर कंक्रीट उखड़ चुकी है, बड़े-बड़े दरारें विकसित हो गई हैं और कुछ हिस्सों में कंक्रीट की परत कमजोर होकर टूटने लगी है।
इससे स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि निर्माण कार्य निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं किया गया। तकनीकी प्रावधानों के अनुसार नहर लाइनिंग में लगभग 4 इंच मोटी कंक्रीट परत डाली जानी थी, ताकि जल रिसाव को रोका जा सके और संरचना लंबे समय तक टिकाऊ बनी रहे। लेकिन मौके पर देखने पर कई स्थानों पर यह परत या तो अनुपस्थित मिली या बेहद कमजोर दिखाई दी। जहां कंक्रीट डाली गई है, वहां भी समय से पहले दरारें पड़ना और परत का उखड़ना निर्माण सामग्री की गुणवत्ता तथा कार्य निष्पादन की गंभीर खामियों की ओर इशारा करता है।
कम समय में ही इसकी स्थिति बिगड़ी ग्रामीणों का कहना है कि इतनी बड़ी लागत से तैयार की गई परियोजना से क्षेत्र के किसानों को लंबे समय तक लाभ मिलने की उम्मीद थी, लेकिन निर्माण के इतने कम समय में ही इसकी स्थिति बिगड़ जाना चिंताजनक है। उनका आरोप है कि यदि निर्माण के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण और नियमित तकनीकी निरीक्षण प्रभावी ढंग से किया गया होता तो इतनी जल्दी यह स्थिति सामने नहीं आती।
यह पूरा निर्माण केवल औपचारिकता जैसी यह परियोजना केवल देवकट्टा से बेलगांव तक सीमित नहीं थी। इसके अंतर्गत कन्हारगांव और रीवागन तक मुख्य एवं माइनर नहरों की लाइनिंग का कार्य भी शामिल था। इसके साथ ही माइनर नहरों के किनारों पर मुरुम फिलिंग का प्रावधान रखा गया था, ताकि नहर संरचना को मजबूती मिल सके और किसानों को खेतों तक आवागमन में सुविधा हो। हालांकि स्थानीय किसानों का कहना है कि अधिकांश स्थानों पर यह कार्य केवल औपचारिकता बनकर रह गया। कई जगह किनारे अधूरे हैं और बरसात के दौरान खेतों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
स्थल निरीक्षण कराया जाएगा, कार्रवाई करेंगे इस संबंध में विभाग के एसडीओ असद सिद्दीकी ने कहा कि मामले का स्थल निरीक्षण कराया जाएगा। यदि शिकायतें सही पाई जाती हैं तो संबंधित ठेकेदार के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि अनुबंध की शर्तों के अनुसार निर्माण कार्य के बाद तीन वर्षों तक मरम्मत और रखरखाव की जिम्मेदारी ठेकेदार की होती है।

