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धरती आबा बिरसा मुंडा: आंदोलन, बलिदान और ब्रिटिश हुकूमत को हिला देने वाली कहानी

By Admin|09 Jun 2026, 5:51 PM
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 रांची
 कोकर के डिस्टिलरी पुल के पास आज के दिन ही नौ जून, 1900 को धरती आबा का अंतिम संस्कार कर दिया गया था। तब, यह क्षेत्र काफी सुनसान था। जंगल था। एक नदी बहती थी, जो अब विकास की भेंट चढ़ गई।

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125 साल पहले 25 साल के युवा बिरसा से ब्रिटिश सरकार डरी-सहमी थी। सुबह-सुबह बिरसा की कथित हैजे से मौत हो गई। जेल में बिरसा की हालत दो दिन पहले खराब हो गई थी। नौ जून को स्थिति और खराब हो गई। नौ बजते-बजते नाड़ी बंद हो गई। डॉक्टरों ने नाड़ी देखी और सरकार इस अप्रत्याशित घटना से सकते में आ गई।

25 साल के युवा से ब्रिटिश सरकार डरी
ऐसा पहली बार हुआ कि 25 साल के युवा से ब्रिटिश सरकार डरी हुई थी। जेल के अंदर दिन भर कवायद जारी रहा। शाम होते ही अंतिम संस्कार कर दिया गया। शव को ब्रिटिश सरकार ने परिवार को सौंपना उचित नहीं समझा।

रांची में 1850 के आसपास स्थापित गोस्सनर चर्च बिरसा के आंदोलन को शक की निगाह से देखता था। बिरसा मुंडा ने मतांतरण के खिलाफ भी आंदोलन चलाया था। इसलिए इस मिशन की पत्रिका घरबंधु ने 15 जून के अंक में खबर छपी।

शीर्षक था-दाऊद बिरसा मर गया। जब बिरसा का बपतिस्मा हुआ था तब यही नाम दाउद ही मिला था, लेकिन जल्द ही वह इस धर्म से दूर, खुद ही एक अलग धर्म बिरसाइत की स्थापना की थी।

पत्रिका ने इसकी सूचना दी
9 जून को दाऊद बिरसा जेल में हैजे से मर गया और उसी दिन में डोम लोग उसको नदी तक ले गये और जेलर बाबू के सामने जलाया। थोड़े दिनों के पीछे हाकिम का बिचारने उसको अपने पास बुलाया और उसका बिचार किया। उस बिचार की निंदा उसने की और अपने मुक्तिदाता को छोड़ दिया था जो कहता है कि स्वर्ग और पृथ्वी का समस्त अधिकार मुझे दिया गया है।

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केवल दो लोग हैजे से पकड़े गए
घरबंधु इस मौत पर अचंभित होता है। आगे लिखता है, बड़े अचंभे की बात है कि जेलखाने के जिस आंगन में बिरसा और उसके निज चेले अपनी-अपनी कोठरी में रहते थे केवल दो जन हैजे से पकड़े गए हैं जो कचहरी में पहुंचाए जाते रहते थे अर्थात बिरसा और बराया मुंडा। वही पहले मर गया।

हैजे से निधन पर घर बंधु संदेह भी करता है। आगे लिखता है-वे सब एक खाना खाते थे और केवल वे ही दो पकड़े गये। निश्चय उनको चुप कराने की लालसा उन लोगों की रही जिन्होंने अपनेको छिपाके बिरसाको उलगुलान करने के लिये उस्काया और निश्चय वे बहुत डरते थे कि बिरसा इजहार देनेके समय में उस उलगुलान का भेद खोलेगा।

कचहरी में बहुत लोग बिरसा के आसपास जमा हुए और उसका गुप्तमें तमाकू वा दूसरी चीजके साथ विष देने का बहुत अवसर मिलता था ऐसा हुआ कि नहीं हुआ सो ईश्वर जानता है।

घरबंधु में प्रकाशित होती थी खबरें
बिरसा मुंडा के आंदोलन की खबरें घरबंधु में प्रकाशित होती रहती थीं। एक तरह से आंदोलन पर इस पाक्षिक पत्रिका की नजर भी रहती थी। 1900 अप्रैल के अंक में बिरसा भगवान का गोलमाल शीर्षक से खबर प्रकाशित की गई। इसमें सरवदा चर्चा पर हुए हमले में दोषी के दंड का जिक्र है।

खबर है- जो उपद्रवी जेल में हें उनका इजहार बराबर लिया जाता रहता है। 27वीं अप्रैल में कातिंगकेलके परौ मुन्डा का बिचार हुआ जिसने सरवदा के रोमन पादरी पर तीर चलाया जिससे वह घायल किया गया, वह जीवन भर दायमुल भेजा जाता है। और पांडु मुन्डा को घर जलाने के कारण सात बरस जेल हुआ।

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एक खबर गया मुंडा को लेकर भी प्रकाशित हुई थी। इस तरह धार्मिक पत्रिका घर बंधु में समय-समय पर इस तरह की खबरें भी ठीक से स्थान पाती थीं। बिरसा मुंडा के साथियों ने सरवदा चर्च पर क्रिसमस की पूर्व संध्या पर हमला किया था, जिसमें फादर हाफमैन भी घायल हो गए थे।

बाद में फादर ने जमीन सुरक्षा को लेकर सीएनटी एक्ट का ड्राफ्ट तैयार किया था और 16 खंडों में इनसाइक्लोपीडिया आफ मुंडारिका लिखी। हाफमैन बाद में जर्मनी अपने देश वापस चले गए थे।

बिरसा जेल अब बन गया स्मारक
रांची जेल की स्थापना 1890 के बाद हुई थी। बिरसा के बलिदान के बाद इस जेल का नाम धरती आबा के नाम से कर दिया गया। पहली बार धरती आबा की बड़े स्तर पर चर्चा तब हुई जब रांची से 40 किमी दूर रामगढ़ में कांग्रेस का महाधिवेशन 1940 के मार्च में हुआ था।

तब गांधी, नेहरू, पटेल से लेर मौलाना आजाद, बाबू राजेंद्र प्रसाद आदि सभी बड़े-छोटे नेता आए थे। उस समय बिरसा मुंडा द्वार बना था और उस समय प्रकाशित स्मारिक में बिरसा मुंडा पर एक लेख भी अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था। लंबे समय बाद, झारखंड बनने के बाद जब नया जेल बना तो इसे स्मारक व पार्क में बदल दिया गया।

जिस कक्ष में बिरसा मुंडा बंदी थे, उसमें एक प्रतिमा लगा दी गई है। इसके बाद जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया था, वहां भी एक स्मारक बना दिया गया है।

कुल पांच साल तक चला आंदोलन
15 नवंबर 1875 को खूंटी जिले के उलिहातू में जन्मे धरती आबा का आंदोलन 1895 से लेकर 1900 तक चला। यानी, 20 साल की उम्र में उन्होंने बिगुल फूंक दिया। हिंदू-ईसाई धर्म का ज्ञान भी प्राप्त किया और एक नया धर्म बिरसाइत धर्म चलाया। पांच साल तक चले इस आंदोलन के कारण ब्रिटिश सरकार को आदिवासी जमीन के लिए एक नया कानून बनाना पड़ा।

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1908 में अस्तित्व में आया यह कानून आज भी जारी है। बिरसा ने कई समाज सुधार के काम भी किए। इसलिए उसे पैगंबर भी कहा गया। मसीहा भी कहा गया। ब्रिटिश लेखक ने ईसा मसीह से भी तुलना की।

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