राजनांदगांव : दुर्गुणों को नजरअंदाज करते आगे बढ़ें, सद्गुणों को अपनाएं…

राजनांदगांव , ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में गुरुवार को खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर के शिष्य मुनि मौलिकप्रभ सागर ने कहा कि प्रगति के बाद भी शिष्य को अपने गुरु को नहीं भूलना चाहिए। अच्छी आत्माएं होती है जो दोषों को नहीं देखती। इसका कारण यह है कि हमारे भीतर अभी तक इस प्रकार का भाव उत्पन्न नहीं हुआ है। हमारे भीतर अभी पात्रता विकसित नहीं हुई है, अपनी पात्रता को जगाओ।
भाव के आधार पर अंदर में जब झांकेंगे तो हमें हमारा गुरु स्थान का पता चलेगा। गुरु के दोषों को जानने के बाद भी शिष्य के मन में कोई दुर्भाव उत्पन्न नहीं होता। वह अपने गुरु के गुणों को ही देखता है। आज की दृष्टि में सामने वाले के पास भले ही सौ गुण हो लेकिन यदि एक दुर्गुण हुआ तो लोगों की नजर इस दुर्गुण पर टिक जाती है। दुर्गुणों को नजरअंदाज करो और सद्गुणों को ग्रहण करो। कहा कि हमारे संबंधों में स्वार्थ हो सकता है किंतु गुरु और शिष्य के संबंध में कोई स्वार्थ नहीं होता। गुरु का शिष्य के प्रति प्रेम, वात्सल्य भाव को समझो। शिष्य को भी प्रगति के बाद गुरु को कभी नहीं भूलना चाहिए।
गुरु की सीख हमारे आचरण में आनी चाहिए मुनि ने कहा कि हम अपने जीवन में कितनी सारी भूल करते हैं। गुरु यदि हमारी भूलों के लिए भरी सभा में हमें डांट भी दे तो हमें यह समझना चाहिए कि हममें पात्रता है। यदि किसी को गुरु का डांटना गलत लगता है तो समझ लेना चाहिए कि पात्रता में कहीं कमी है। यदि एकांत में भी गुरु को अपने शिष्य की गलती पर डांटने में सुकुचाहट होती है तो समझ लेना उसकी पात्रता में कहीं कोई कमी है। कहा कि गुरु की सीख हमारे आचरण में आनी चाहिए। विचारों के मंथन से जो मक्खन निकलेगा उसमें यदि आप डूब गए तो आपका जीवन सफल हो जाएगा।



