राजनांदगांव : भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी है श्रीमद् भागवत : गोस्वामी…
राजनांदगांव , प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी की तरह श्रीमद् भागवत कथा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी है। कथा श्रवण से भगवान के प्रति अनुराग उत्पन्न होता है। भक्ति से ज्ञान और ज्ञान से वैराग्य की प्राप्ति होती है। जब जीव भगवान की शरण में पहुंचता है तो उसे संसार की मोह-माया निरर्थक लगने लगती है। यह बात वृंदावन के प्रसिद्ध भागवत आचार्य बांके बिहारी गोस्वामी ने कही। वे लोहिया परिवार द्वारा पितृ मोक्षार्थ श्री अग्रसेन भवन में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के प्रथम दिन कथा की व्याख्या कर रहे थे।
आचार्य ने कहा कि आत्मा परमात्मा का ही स्वरूप है। मनुष्य को अपने कर्मों को ईश्वर को अर्पित करते हुए कर्मबंधन से बचने का प्रयास करना चाहिए। परिवार, माता-पिता, पुत्र-पुत्री और सगे-संबंधी संसार रूपी भवसागर की लहरों के समान हैं। इनके प्रति कर्तव्य निभाते हुए भी मनुष्य को परमात्मा के प्रति अपनी आस्था बनाए रखनी चाहिए। कथा श्रवण और प्रभु चिंतन से ज्ञान उत्पन्न होता है, जो संसार के प्रति वैराग्य का मार्ग प्रशस्त करता है। भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति अंततः मोक्ष का मार्ग खोलती है। शिव परिवार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भगवान शिव के परिवार में वाहन और सदस्य एक-दूसरे के स्वभाव से विपरीत होने के बावजूद सामंजस्य के साथ रहते हैं। इसी तरह परिवार में भी बड़ों का सम्मान करते हुए प्रेम और समन्वय बनाए रखना चाहिए।
वृंदावन की धरती पर भक्ति को मिली तरुणाई भागवत महात्म्य का वर्णन करते हुए उन्होंने देवर्षि नारद और भक्ति के प्रसंग की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि नारद जी ने अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हुए वृंदावन में एक सुंदर युवती को विलाप करते देखा। उसके पास ज्ञान और वैराग्य नामक दो वृद्ध मूर्छित अवस्था में पड़े थे। युवती ने अपना परिचय भक्ति के रूप में दिया और बताया कि वृंदावन की धरती पर पहुंचते ही उसे तरुणाई प्राप्त हो गई, जबकि उसके दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य वृद्ध हो गए। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में भक्त मौजूद रहे।




