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डोंगरगांव , शांतिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर की धर्मसभा में साध्वी आज्ञांजना जी मसा ने बुधवार को कहा कि सत्य को कोई डिगा नहीं सकता। वह स्तंभ की तरह अडिग रहता है। तर्क-वितर्क करने मात्र से झूठ सत्य नहीं बन सकता। सत्य केवल देखने की नहीं, समझने और जीवन में उतारने की चीज है। परमात्मा ने जो कहा है, उसे श्रद्धापूर्वक स्वीकार करते हुए अपनी क्षमता के अनुसार आचरण में उतारना चाहिए। दृष्टि बदलते ही जीवन को देखने का नजरिया भी बदल जाता है।
आज शादी-ब्याह और दूसरे सामाजिक आयोजनों में लोग दिखावे और प्रशंसा के लिए आडंबर करते हैं, लेकिन धर्म के क्षेत्र में कोई व्यवस्था दिखाई दे तो उसे आडंबर कह दिया जाता है। धर्म से जुड़ी प्रत्येक व्यवस्था का उद्देश्य लोगों को धर्म से जोड़ना और उसके स्वरूप की जानकारी देना है। जहां धर्म चर्चा या धर्म से संबंधित कोई भाव ही नहीं है, वहां केवल बाहरी क्रिया को धर्म मान लेना मिथ्यात्व है। कहा कि जैन धर्म का मूल सिद्धांत जीव मात्र को हिंसा से बचाना है। गुरु भगवंतों ने हजारों वर्ष पहले ही पानी, मिट्टी और हवा में भी असंख्य जीवों की उपस्थिति बताई है। परमात्मा के वचनों पर श्रद्धा न रखकर अपनी ही मान्यता को सही मानना मिथ्यात्व के दायरे में आता है।
मसा ने कहा कि जीवन में सुख और दुःख का आना-जाना लगा रहता है। दोनों एक जगह टिकने वाले नहीं हैं। सुख आता है तो चला जाता है और दुःख आता है तो वह भी समय के साथ टल जाता है। इसलिए हर परिस्थिति को समता के भाव से स्वीकार करना चाहिए। कहा कि जीवन में यह भाव जागृत होना चाहिए कि जो हो रहा है, वह मेरे लिए आत्मकल्याण की दिशा में अवसर बन सकता है। समता का भाव रहेगा तो परिस्थितियां मन को अधिक विचलित नहीं करेंगी और धर्म के प्रति आस्था बढ़ेगी।
