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CG : अबूझमाड़ के जंगलों से निकला सुशासन का उजाला

By lokesh sharma|04 Nov 2025, 12:36 PM
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कच्चापाल की महिलाओं ने रच दी आत्मनिर्भरता की मिसाल, जैविक बासमती से बदली तकदीर

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रायपुर,

कच्चापाल की महिलाओं ने रच दी आत्मनिर्भरता की मिसाल, जैविक बासमती से बदली तकदीर

कभी नक्सल हिंसा और भय के साये में जीवन जीने वाले नारायणपुर जिले के ओरछा विकासखण्ड के अबूझमाड़ क्षेत्र के ग्राम कच्चापाल में अब सुशासन और आत्मनिर्भरता की किरणें पहुँच चुकी हैं। यह वही इलाका है जहाँ कभी बम धमाकों की गूँज और बंदूकों की आवाज़ें विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा थीं। सड़क, बिजली, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित यह गांव अब नियद नेल्ला नार योजना के तहत विकास की मुख्यधारा से जुड़ चुका है।

कच्चापाल की महिलाओं ने रच दी आत्मनिर्भरता की मिसाल, जैविक बासमती से बदली तकदीर

राज्योत्सव के भव्य मंच पर इस परिवर्तन की गूंज सुनाई दी जब कच्चापाल के आश्रित ग्राम ईरकभट्टी की दो महिलाएँ – मांगती गोटा और रेनी पोटाई – अपने हाथों से उगाई गई जैविक बासमती चावल लेकर राजधानी पहुँचीं। ये महिलाएँ राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के लालकुंवर स्व-सहायता समूह से जुड़ी हैं। कभी शहर का नाम तक न जानने वाली ये महिलाएँ आज अपने गाँव की पहचान बन चुकी हैं।

एरिया कोऑर्डिनेटर सोधरा धुर्वे बताती हैं कि पहले इस क्षेत्र में लाल आतंक के कारण कोई सरकारी योजना पहुँच ही नहीं पाती थी। ग्रामीणों के पास बाजार की जानकारी नहीं थी, और बिचौलिए उनके उत्पादों को औने-पौने दामों पर खरीदकर मुनाफा कमा लेते थे। लेकिन सशस्त्र बलों के कैम्प लगने और शासन की सक्रिय पहल से जब ‘नियद नेल्ला नार’ योजना के तहत बिहान समूहों का गठन हुआ, तो हालात बदलने लगे। महिलाओं में बचत की आदत और आत्मनिर्भरता का भाव बढ़ा।

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मांगती गोटा बताती हैं, “हम हमेशा से बिना रासायनिक खाद के जैविक तरीके से बासमती चावल उगाते रहे हैं। पहले बिचौलिए हमसे 15–20 रुपये किलो में चावल ले जाते थे। लेकिन बिहान योजना से जुड़ने और प्रशिक्षण मिलने के बाद हमें असली कीमत का पता चला। आज राज्योत्सव में हमारे चावल की कीमत 120 रुपये किलो मिल रही है। लोग इसे शुद्ध और जैविक जानकर बहुत उत्साह से खरीद रहे हैं।”

रेनी पोटाई बताती हैं कि उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा भी हमारे गाँव आये थे तो हमारी समूह की महिलाओं को प्रोत्साहित किया था। “इस बार हमने सिर्फ चावल नहीं, बल्कि बाँस की टोकनी और झाड़ू भी तैयार किए हैं। हमारे समूह ने इस साल 40 क्विंटल जैविक बासमती चावल का उत्पादन किया है,” उन्होंने मुस्कराते हुए बताया।

आज कच्चापाल और उसके आसपास के ग्रामों में महिलाओं की मेहनत और शासन की योजनाओं का फल साफ दिखाई दे रहा है। नक्सल प्रभावित इलाका अब आत्मनिर्भरता, रोजगार और शांति का प्रतीक बन चुका है। कभी अंधेरे में डूबे इन ग्रामों में अब सुशासन का सवेरा सचमुच उतर आया है — और यह कहानी है उस परिवर्तन की, जो भय से विश्वास और गरीबी से समृद्धि तक का सफर तय कर रही है।कच्चापाल की महिलाओं के साहस, स्वावलंबन और नवछत्तीसगढ़ की नई सुबह की यह सच्ची कहानी अन्य महिलाओं को आगे बढ़ने और आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दे रही है।

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lokesh sharma

Lokesh Sharma | Editor Lokesh Sharma is a trained journalist and editor with 10 years of experience in the field of journalism. He holds a BAJMC degree from Digvijay College and a Master of Journalism from Kushabhau Thakre University of Journalism & Mass Communication. He has also served as a Professor in the Journalism Department at Digvijay College. Currently, he writes on Sports, Technology, Jobs, and Politics for kadwaghut.com.

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