राजनांदगांव : सौ गुरुओं के बराबर एक माता-पिता होते हैं: मुनि…

राजनांदगांव , ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में बुधवार को उद्गार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर मुनि समयप्रभ सागर ने कहा कि साल भर में हमने कितना आनंद लिया है, यह हमें नहीं पता लेकिन हम यह अवश्य कर सकते हैं कि हमारा आने वाला समय आनंदमय हो। इसके लिए एक ही मार्ग है वह है आराधना का। आराधना से हम वर्तमान के साथ-साथ आने वाले समय के लिए भी आनंद प्राप्त कर सकते हैं। आराधना में भाव को होना आवश्यक है।
बिना भाव के आराधना नहीं हो सकती। मां का स्नेह रोके नहीं रुकता है। मां की दृष्टि बच्चों के प्रति ममत्व की होती है। परमात्मा की जितनी भी पूजा कर लो मां-बाप के प्रति जो हमारा ऋण है वह कभी नहीं चुकाया जा सकता। सौ गुरुओं के बराबर एक माता-पिता होते हैं। मुनिश्री ने कहा कि मां की महिमा की कोई व्याख्या नहीं की जा सकती।
इसी तरह सास की दृष्टि में बहू का बहुमान होना चाहिए, तभी वह बहू सफल मानी जा सकती है। एक मां जितने अपने बच्चों के बारे में जानती है उतना गुरु नहीं जान सकता। मां-बाप हमारी सफलता के पीछे के मुख्य कारण होते हैं। मां-बाप हमारे जीवन का आधार हैं।

