छत्तीसगढ़राजनांदगांव जिला

राजनांदगांव की महिला 224 दिन बाद पहुंची हाईकोर्ट, उम्र-गरीबी का दिया हवाला; अदालत ने देरी माफ करने से किया इनकार

By kadwaghut|22 Aug 2026, 11:20 PM
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राजनांदगांव। एक आपराधिक मामले में 224 दिन की देरी से हाईकोर्ट पहुंची राजनांदगांव की 51 वर्षीय महिला को अदालत से राहत नहीं मिली। महिला ने 31 जनवरी 2024 के आदेश को चुनौती देने के लिए क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन दाखिल की थी। याचिका दाखिल करने में हुई देरी को माफ करने के लिए महिला की ओर से उम्र, आर्थिक परेशानी, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और बच्चों पर निर्भरता का हवाला दिया गया था। हालांकि, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इन कारणों को पर्याप्त नहीं माना और देरी माफी की याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा- सिर्फ गरीबी और उम्र देरी का पर्याप्त कारण नहीं

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने की। महिला की ओर से दलील दी गई कि वह गृहिणी हैं और अपने बच्चों पर निर्भर हैं। परिवार आर्थिक और मेडिकल परेशानियों से भी गुजर रहा था, जिसके कारण समय पर कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकी।

अदालत ने कहा कि ‘पर्याप्त कारण’ (Sufficient Cause) ऐसा ठोस और संतोषजनक कारण होना चाहिए, जिसने वास्तव में पक्षकार को निर्धारित समय के भीतर अदालत का दरवाजा खटखटाने से रोका हो। केवल गरीबी, बुढ़ापा या कानून की जानकारी का अभाव अपने आप में देरी को माफ करने का आधार नहीं बन सकता।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मध्य प्रदेश राज्य बनाम रामकुमार चौधरी मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि देरी माफी का विवेक प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को देखकर न्यायिक तरीके से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यदि मामले में लापरवाही, उदासीनता या पर्याप्त स्पष्टता का अभाव दिखाई देता है तो केवल उदार दृष्टिकोण अपनाकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता।

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अदालत ने 224 दिनों की देरी को अत्यधिक माना और महिला की ओर से बताए गए कारणों को पर्याप्त नहीं पाया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने देरी माफी की याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सीमा कानून (Limitation Law) सार्वजनिक नीति पर आधारित है। इसका उद्देश्य मुकदमों में अनिश्चितता को रोकना और कानूनी विवादों के लिए निश्चित समय-सीमा सुनिश्चित करना है। ऐसे में निर्धारित समय के बाद याचिका दाखिल करने वाले पक्षकार को देरी का ठोस और विश्वसनीय कारण बताना जरूरी है।

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