नई दिल्ली/रायपुर। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल को पाटन विधानसभा सीट से जुड़े चुनावी मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें भूपेश बघेल के 2023 विधानसभा चुनाव को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर खारिज करने से मना किया गया था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि भूपेश बघेल हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान अपने सभी कानूनी और तथ्यात्मक तर्क रखने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।
CJI की पीठ ने याचिका का किया निपटारा
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने भूपेश बघेल की विशेष अनुमति याचिका (SLP) का निपटारा किया। बघेल ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 15 जून के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने उनके उस आवेदन को खारिज कर दिया था, जिसमें चुनाव याचिका को प्रथम दृष्टया सुनवाई योग्य नहीं बताते हुए समाप्त करने की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भूपेश बघेल के पास अपने बचाव के पर्याप्त कानूनी तर्क हैं और हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही के दौरान वह सभी बिंदु चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष रख सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी ओर से हस्तक्षेप न करने का अर्थ यह नहीं है कि बघेल के बचाव के अधिकार सीमित हो गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
भूपेश बघेल के खिलाफ दायर चुनाव याचिका में आरोप लगाया गया है कि 16 नवंबर 2023 को, जब मतदान से पहले 48 घंटे की प्रचार-निषेध (Silence Period) लागू थी, तब उन्होंने पाटन विधानसभा क्षेत्र में एक कार्यक्रम और रोड शो में हिस्सा लिया। इसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 की धारा 126 तथा आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताया गया है।
कपिल सिब्बल ने रखा बघेल का पक्ष
भूपेश बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि चुनाव याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रचार 15 नवंबर को समाप्त हो गया था और 16 नवंबर को भूपेश बघेल केवल एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
सिब्बल ने यह भी कहा कि यदि धारा 126 का उल्लंघन मान भी लिया जाए, तब भी यह केवल एक चुनावी अपराध (Electoral Offence) हो सकता है, लेकिन इसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(7) के तहत ‘भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practice)’ नहीं माना जा सकता।
चुनाव परिणाम पर असर का सवाल
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि क्या कथित उल्लंघन से चुनाव परिणाम वास्तव में प्रभावित हुआ था। इस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि यह पूरी तरह तथ्यात्मक प्रश्न है। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता के अनुसार कार्यक्रम में लगभग 200 लोग ही मौजूद थे, जबकि भूपेश बघेल ने यह चुनाव लगभग 20 हजार वोटों के बड़े अंतर से जीता था। ऐसे में यह कहना उचित नहीं होगा कि कथित कार्यक्रम का चुनाव परिणाम पर कोई निर्णायक प्रभाव पड़ा।
प्रचार रोक अवधि के उल्लंघन से किया इनकार
भूपेश बघेल ने अपनी याचिका में 48 घंटे की प्रचार रोक अवधि के उल्लंघन के आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि चुनाव याचिका में पर्याप्त तथ्य नहीं हैं, आरोप केवल अनुमान और आशंकाओं पर आधारित हैं तथा RPA की धारा 83 के तहत आवश्यक शपथपत्र (हलफनामा) भी प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसलिए चुनाव याचिका प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज की जानी चाहिए थी।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चुनाव न्यायाधिकरण में आगे बढ़ेगा। वहां दोनों पक्ष अपने-अपने साक्ष्य और कानूनी तर्क पेश करेंगे। हाईकोर्ट इस आधार पर तय करेगा कि चुनाव याचिका में लगाए गए आरोपों में कितना दम है और क्या उनका चुनाव परिणाम पर कोई प्रभाव पड़ा।
प्रमुख बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने भूपेश बघेल की याचिका पर हस्तक्षेप से किया इनकार।
- पाटन विधानसभा चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका हाईकोर्ट में जारी रहेगी।
- अदालत ने कहा कि बघेल चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष सभी तर्क रखने के लिए स्वतंत्र हैं।
- मामला 2023 विधानसभा चुनाव के दौरान कथित 48 घंटे की प्रचार रोक अवधि के उल्लंघन से जुड़ा है।
- अब चुनाव याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई होगी।
