छत्तीसगढ़

मजदूरी छोड़ डेयरी फार्मिंग से बदली किस्मत: छत्तीसगढ़ के ललित यादव ने ‘मल्टी-फार्मिंग’ से पेश की सफलता की मिसाल

By Admin|29 Apr 2026, 11:02 PM
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यह एक बहुत ही प्रेरणादायक कहानी है! ललित यादव की यह यात्रा “मजदूरी से समृद्धि तक” की कहानी न केवल दिल को छू लेने वाली है, बल्कि उन लोगों के लिए एक ब्लूप्रिंट भी है जो कृषि और डेयरी में अपना करियर बनाना चाहते हैं।

क्या कोई कल्पना कर सकता है कि एक मजदूर, जो कभी दूसरों के खेतों में पसीना बहाता था, आज खुद एक बड़े डेयरी साम्राज्य और मल्टी-फार्मिंग मॉडल का मालिक होगा? दंतेवाड़ा के ललित यादव ने अपनी मेहनत और वैज्ञानिक सोच से इस कल्पना को हकीकत में बदल दिया है।

6 गायों से 25 के कुनबे तक: एक संघर्षपूर्ण शुरुआत

ललित की सफलता की कहानी साल 2013 में मात्र 6 गायों के साथ शुरू हुई थी। आज उनके अटूट साहस के कारण यह संख्या बढ़कर 25 हो चुकी है। कभी अपनी आजीविका के लिए निर्माण कार्यों और दूसरों की खेती पर निर्भर रहने वाले ललित अब खुद कई लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।

आधुनिक तकनीक और डेयरी का क्रांतिकारी मेल

ललित यादव की सफलता का सबसे बड़ा राज पारंपरिक खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ना है। पशुपालन विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने अपनी डेयरी को एक नया स्वरूप दिया है:

• उन्नत नस्लें: जर्सी और एचएफ क्रॉस जैसी विदेशी और उन्नत नस्लों का पालन।
• दूध उत्पादन: वर्तमान में प्रतिदिन 70 से 80 लीटर दूध का उत्पादन।
• आय का जरिया: 70 रुपये प्रति लीटर की दर से दूध बेचकर आर्थिक स्थिति को किया मजबूत।
• नेपियर घास का जादू: चारे के खर्च को कम करने के लिए खुद नेपियर घास उगाकर 12 महीने पौष्टिक चारा सुनिश्चित किया।

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सिर्फ डेयरी नहीं, ‘मल्टी-फार्मिंग’ मॉडल से बढ़ी आय

ललित की दूरदर्शिता केवल दूध तक सीमित नहीं रही। उन्होंने आय के स्रोतों को विविधता प्रदान करने के लिए मल्टी-फार्मिंग (Multi-Farming) का सहारा लिया है:

1. वैल्यू एडिशन (Value Addition)

जब दूध की मात्रा अधिक होती है, तो ललित उसे केवल कच्चे दूध के रूप में नहीं बेचते, बल्कि उसका पनीर बनाते हैं। बाजार में यह पनीर 400 रुपये प्रति किलो की दर से हाथों-हाथ बिक जाता है।

2. मुर्गी पालन और सब्जी उत्पादन

डेयरी के साथ-साथ छोटे स्तर पर पोल्ट्री और सब्जियों की खेती से उन्हें साल भर नकद आय प्राप्त होती रहती है।

3. जैविक खाद की भारी डिमांड

गोबर अब केवल कचरा नहीं, बल्कि आय का बड़ा हिस्सा है। ललित की डेयरी से प्राप्त गोबर खाद की इतनी डिमांड है कि अन्य जिलों के किसान इसे 3000 से 3500 रुपये प्रति ट्रैक्टर की दर से खरीदने उनके द्वार तक आते हैं।

बैंकिंग सुविधाओं और ईमानदारी का संगम

ललित ने सिद्ध कर दिया कि यदि नियत साफ हो, तो बैंक भी आपकी प्रगति में भागीदार बनते हैं। उन्होंने डेयरी शेड और फेंसिंग के लिए 3 लाख रुपये का बैंक ऋण लिया था, जिसे अपनी कड़ी मेहनत से समय से पहले ही चुकाकर अपनी विश्वसनीयता साबित की।
माँ का संघर्ष और सफलता का श्रेय
ललित अपनी इस सफलता का श्रेय अपनी माँ को देते हैं। एक आंगनबाड़ी सहायिका के रूप में काम करते हुए उनकी माँ ने विपरीत परिस्थितियों में उन्हें पढ़ाया-लिखाया। आज ललित न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए एक प्रेरक प्रकाश स्तंभ बनकर उभरे हैं।

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निष्कर्ष:

ललित यादव की कहानी इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सही मार्गदर्शन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ईमानदारी से किए गए प्रयास ग्रामीण अंचलों में भी खुशहाली का नया अध्याय लिख सकते हैं।

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