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CG : ‘रायपुर’ नेताओं की राजनीतिक शून्यता, भौतिक विकास में बाधा …

By lokesh sharma|16 Mar 2026, 12:29 PM
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रायपुर (जसेरि)। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की राजनीति में कुछ सालों से बाहरी नेताओं के दखल भी अब बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है। राजधानी में अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में रायपुर के नेताओ की तूती भोपाल में बोलती थी।

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समय के साथ मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य बनते ही प्रदेश की राजनीति में बाहरी घुसपैठिए नेताओ्ं ने पैर जमाना शुरू किया औऱ आज हालात ये है कि रायपुर से स्थानीय नेता गाय़ब और बाहरी नेता राजसुख भोग रहे है। स्थानीय नेता मार्गदर्शक मंडल में चले गए है। एक समय में दोनों पार्टियों में राजधानी से किसी नेता को तवज्जो देते हुए मंत्रिमंडल में स्थान दिया जाता था लेकिन अब निगम मंडल में जगह देकर ही चुप कराया जा रहा है जो जग जाहिर भी है।

दो दशक पहले रायपुर का नाम कद्दावर नेताओ में शुमार होता था। लेकिन अब वह शून्य नजऱ आ रहा है। कभी राजनीति के आसमान में दोनों पार्टी के नेता छाए रहते थे । लेकिन अभी ऐसा दिख नहीं रहा है। कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल जो इंटनेशनल नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए थे, उनके बड़े भाई श्यामाचरण शुक्ल, रमेश बैस, सत्यनारायण शर्मा के बाद बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत भी रायपुर को आगे ले जाने वालों की लाइन में आ गए थे, लेकिन ऐसी क्या मजबूरी हुए की इन सबको दरकिनार कर दिया गया।

कभी प्रदेश की राजनीति में रायपुर वालों का दबदबा हुआ करता था । लेकिन आज रायपुर का फैसला दूसरे जिले के नेता ले रहे हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ में भी मंत्रिमंडल में रायपुर के नेताओं को लिया जाता था लेकिन अब ऐसा क्या हुआ कि उन्हें दरकिनार कर दिया गया। जबकि रायपुर की मिजाज को समझने के लिए खास रायपुर के नेताओं की जयादा जरुरत है लेकिन दोनों पार्टी इस पर ध्यान नहीं दे रही है। अभी के राजनीति में स्थानीय बनाम बाहरी की चर्चा अक्सर चौक चौराहों और चाय की टपरी में होने लगी है।

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देखा ये जा रहा है कि रायपुर के बारे में रायपुर के लोग निर्णय नहीं ले पर रहे है गांव के लोग ही निर्णय लेने लगे हैं जिस पर भी चर्चा होते ही रहती है। हालाँकि यह मुद्दा मुख्य रूप से राजनीतिक नियुक्तियों, टिकट वितरण और सत्ता के केंद्र में स्थानीय नेताओं की अनदेखी से जुड़ा होता है। जबकि कायदे से कांग्रेस या भाजपा दोनों पार्टी को खासकर रायपुर के स्थानीय नेताओं को भरोसे में लेकर उनको पद देना चाहिए जिससे रायपुर का विकास सोचने वाला हो. देखा जा रहा है कि अभी रायपुर का खैरख्वाह अब रायपुर का नेता नहीं बल्कि दूसरे जिले का नेता बने हुए हैं।

वर्तमान परिदृश्य में तो बहस का मुद्दा ही बन गया है। समय-समय पर यह आरोप लगते रहे हैं कि रायपुर की राजनीति और शासन में अन्य राज्यों के बड़े नेताओं या सलाहकारों का प्रभाव अधिक रहा है। विशेष रूप से चुनाव प्रबंधन और रणनीतिक फैसलों में दिल्ली या अन्य राज्यों से आए प्रभारियों की सक्रियता को स्थानीय कार्यकर्ता कभी-कभी बाहरी दखल के रूप में देखने लगे हैं जो अपने प्रदेश के नेताओ को ज्यादा तवज्जो देते है और स्थानीय नेताओ की अनसुनी करते हैं. ऐसा स्थानीय नेताओ का कहना है।

रायपुर जैसे महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में जब पार्टी किसी ऐसे व्यक्ति को प्रत्याशी बनाती है जो मूल रूप से वहां का नहीं है, तो स्थानीय दावेदारों और समर्थकों के बीच असंतोष उभरता है। हालाँकि पार्टी के आदेश मानकर भारी मन से उसको जिताने में मदद करते ही हैं लेकिन ऐसा कब तक इसे स्थानीय राजनीति में बाहरी लोगों का बढ़ता प्रभाव माना जा रहा है।

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देखा जा रहा है कि रायपुर राज्य की राजधानी होने के नाते सत्ता का मुख्य केंद्र भी है। इसके साथ राज्य के अन्य जिलों के प्रभावशाली नेताओं का रायपुर में आकर बसना और वहां की राजनीति को नियंत्रित करना भी एक तरह का दखल माना जाता है, जिससे रायपुर के मूल राजनीतिक परिवारों को कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों का ही प्रभाव रहा है ।

इन दोनों दलों में आलाकमान की भूमिका ही सर्वोपरि माना जाता है जिसका स्थानीय स्तर पर कोई विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। क्षेत्रीय दल अक्सर इसी मुद्दे को आधार बनाकर स्थानीय अस्मिता की बात करते हैं। जो अभी छत्तीसगढ़ पार्टी के नेता ज्यादा ही इसे प्रचारित कर रहे हैं ऐसे में दोनों दलों को रायपुर के स्थानीय नेताओ को मुख्यधारा में लेकर रायपुर के विकास की गति को बढ़ाना होगा ही।

ऐसा सिर्फ अभी नहीं बल्कि अविभाजित मध्यप्रदेश में भी देखने को मिलता था। अविभाजित मध्य प्रदेश में छत्तीसगढ़ के प्रमुख कद्दावर नेताओ की राष्ट्रीय स्तर पर तूती बोलती थी। रायपुर के नेताओं के प्रस्ताव को दिल्ली में बैठे नेताओ की मंजूरी मिलने में देरी नहीं लगती थी लेकिन ये रायपुर का दुर्भाग्य ही कहें की यहाँ के स्थानीय नेताओं को तवज्जो है नहीं दिया जा रहा है।

देखा जाए तो पं. रविशंकर शुक्ल से लेकर पं. रविशंकर शुक्ल पं जवाहरलाल नेहरू के बहुत करीबी थे। उनके बाद पं. शुक्ल के दोनों पुत्रों ने प्रदेश औऱ राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई एैसे सर्वमान्य नेता थे जो नामांकन के चुनाव प्रचार करने भी नहीं जाते थे। उसके पीछे कारण यही था कि प्रदेश का कोई भी आमआदमी मिल सकता था, कोई बंदिशें नहीं थी।

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गांव के लोग सीधे श्यामाचरण -विद्याचरण से बात कर अपनी समस्या बता देते थे. और उनके समस्या का समाधान तुरंत हो जाता था एैसा उस जमाने के लोग बताते है जो उनके साथ काम करते थे। चुनाव में उनके समर्थक कार्यकर्ता स्वयं अपने नेता के जीत के लिए एड़ी चोटी एक कर देते थे।

इस तरह के नेता भाजपा में भी मौजूद थे जैसे की रमेश बैस, बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत सहित कई ऐसे नाम हैं जो स्थानीय हैं और जिन्होंने रायपुर के विकास में कोई कोर कसार बाकि नहीं रखा है साथ ही उन्होंने पुरे प्रदेश में विकास कार्य भी कराया है, लेकिन उन्हें किनारे कर दिया गया है या महत्त्व नहीं दिया जा रहा है साथ ही दूसरे अन्य नेताओ को निगम मंडल में पद देकर खामोश कर दिया गया है जो सिर्फ अपने और अपने परिवार की भलाई तक ही सीमित रह गए हैं।

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lokesh sharma

Lokesh Sharma | Editor Lokesh Sharma is a trained journalist and editor with 10 years of experience in the field of journalism. He holds a BAJMC degree from Digvijay College and a Master of Journalism from Kushabhau Thakre University of Journalism & Mass Communication. He has also served as a Professor in the Journalism Department at Digvijay College. Currently, he writes on Sports, Technology, Jobs, and Politics for kadwaghut.com.

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