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‘दागी-निर्दोष अलग नहीं हो सकते’, राजस्थान SI भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला सही ठहराया

By Admin|04 May 2026, 9:51 PM
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जयपुर

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राजस्थान एसआई भर्ती पेपर लीक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चयनित उम्मीदवारों को राहत देने से इनकार कर दिया है. अदालत ने इस संबंध में दायर विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि हुई है जिसमें बड़े पैमाने पर पेपर लीक के कारण पूरी भर्ती प्रक्रिया रद्द कर दी गई थी. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि वह ऐसी गंभीर अनियमितताओं से ग्रस्त चयन प्रक्रिया को मंजूरी नहीं दे सकता, जहां राजस्थान में बड़े पैमाने पर पेपर लीक हुआ था.

राजस्थान सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा 2021 से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने आज इन मामलों की सुनवाई की. ये याचिकाएं राजस्थान हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच के 4 अप्रैल 2026 के फैसले से उपजी थीं, जिसमें पूरी भर्ती रद्द कर नई परीक्षा के आदेश दिए गए थे. वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और पी.एस. पटवालिया की विस्तृत दलीलों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करने की सहमति नहीं दी और याचिकाओं को खारिज कर दिया.

कोर्ट की गंभीर टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया की अखंडता पर गंभीर टिप्पणियां कीं. कोर्ट ने नोट किया कि राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) के एक सदस्य की पेपर लीक से जुड़े मामले में गिरफ्तारी हुई थी, जिसकी जमानत सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी थी. यह गंभीर व्यवस्थागत भ्रष्टाचार का संकेत देता है. कोर्ट ने जोर दिया कि ऐसी स्थिति में 'दागी' और 'निर्दोष' उम्मीदवारों को अलग करना ही कानूनी रूप से टिकाऊ रास्ता है, जो इस मामले में संभव नहीं था, इसलिए पूरी प्रक्रिया अविश्वसनीय हो गई.

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बेंच ने अपने पूर्व फैसले का हवाला दिया, जहां केवल 44 दागी एमबीबीएस उम्मीदवारों के कारण पूरे देश में परीक्षा रद्द कर दी गई थी, जो परीक्षा धांधली के मामलों में सख्त मानक को रेखांकित करता है.

परीक्षार्थियों की दलील
याचिकाकर्ताओं ने दलीलें दी कि कोई बड़े पैमाने पर पेपर लीक नहीं था, जो सांख्यिकीय विश्लेषण और अंकों के बेल-कर्व वितरण पर आधारित थी. उनकी दलील थी कि केवल 6.3% उम्मीदवार ही कथित रूप से दागी थे, और अलगाव संभव था. इनमें से 838 से अधिक उम्मीदवारों को नियुक्ति मिल चुकी थी और वे दो वर्ष से अधिक सेवा दे चुके थे, जिसमें प्रशिक्षण पर भारी सार्वजनिक व्यय हुआ था. फिर भी, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निष्कर्ष में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया कि प्रक्रिया दोषपूर्ण थी.

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