छत्तीसगढ़

धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम प्रभावी: छत्तीसगढ़ सरकार ने राजपत्र में किया प्रकाशन

By Admin|18 Apr 2026, 7:02 PM
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रायपुर.

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छत्तीसगढ़ में जबरन और प्रलोभन से धर्मांतरण पर रोक लगाने 19 मार्च को विधानसभा में पारित छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक ने कानून का रूप ले लिया है. विधेयक पर 6 अप्रैल को राज्यपार रमेन डेका के हस्ताक्षर करने के बाद अब छत्तीसगढ़ राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया है.

बता दें कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में 19 मार्च को उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा प्रस्तुत छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 को विस्तृत चर्चा और विचार-विमर्श के बाद पारित किया गया था. विधेयक का उद्देश्य राज्य में धर्मांतरण से संबंधित गतिविधियों को सुव्यवस्थित करना और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करना है. उपमुख्यमंत्री शर्मा ने विधेयक के संबंध में कहा था कि वर्ष 1968 से लागू प्रावधान वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त नहीं रह गए थे. बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में धर्मांतरण से जुड़े विवादों के कारण सामाजिक तनाव और वर्ग संघर्ष की स्थितियां बनीं, जो कई बार प्रशासन और न्यायालय तक पहुंचीं. ऐसे परिदृश्य में एक स्पष्ट, पारदर्शी और प्रभावी कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की गई, जिससे समाज में बार-बार उत्पन्न होने वाले विवादों को रोका जा सके और समरसता को बनाए रखा जा सके.

विधेयक में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं. अब धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष आवेदन देना होगा, जिसके बाद निर्धारित समय-सीमा में सूचना सार्वजनिक की जाएगी और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी. जांच के उपरांत ही प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा से धर्म चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता रहे, लेकिन यह परिवर्तन किसी दबाव, प्रलोभन या भय के कारण न हो, इसकी जांच अनिवार्य होगी.

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इस कानून में धर्मांतरण कराने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए पंजीयन अनिवार्य किया गया है. इसके लिए प्राधिकृत अधिकारी को हर वर्ष विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें धर्मांतरण से संबंधित जानकारी का विवरण शामिल होगा. ग्राम सभा को भी इस प्रक्रिया में भागीदारी दी गई है, जिससे स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके. विवाह को धर्मांतरण का आधार नहीं माना गया है, और विवाह के बाद भी धर्म परिवर्तन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक होगा. अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए विधेयक में कड़े दंड के प्रावधान किए गए हैं. जिसमें अवैध धर्मांतरण रोकने के लिए सामान्य अवैध धर्मांतरण पर 7 से 10 वर्ष तक कारावास एवं न्यूनतम 5 लाख रुपए तक जुर्माना, विशेष वर्ग जिसमें महिला, अनुसूचित जाति, जनजाति, नाबालिग आदि शामिल है, के अवैध धर्मांतरण पर 10 से 20 वर्ष तक कारावास एवं न्यूनतम 10 लाख रुपए जुर्माना, सामूहिक अवैध धर्मांतरण पर 10 वर्ष से आजीवन कारावास एवं न्यूनतम 25 लाख रुपए जुर्माना का प्रावधान है.

इसी तरह लोक सेवक द्वारा इस प्रकार का अपराध किया जाता है तो उसे 10 से 20 वर्ष कारावास एवं 10 लाख रुपए तक जुर्माना का प्रावधान किया गया है, वैसे ही धन के माध्यम से धर्मांतरण किए जाने संबंधित व्यक्ति को 10 से 20 वर्ष कारावास एवं 20 लाख रुपए तक जुर्माना का प्रावधान किया गया है. भय या प्रलोभन द्वारा धर्मांतरण पर 10 से 20 वर्ष कारावास एवं न्यूनतम 30 लाख रुपए जुर्माना का भी प्रावधान है. इन अपराधों की पुनरावृत्ति किए जाने पर संबंधित को आजीवन कारावास और पीड़ितों के लिए प्रतिकार व्यवस्था विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है.

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इस विधेयक में प्रतिकार व्यवस्था के तहत यदि किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन दबाव, प्रलोभन या धोखे से किया गया हो, तो उसे स्पष्ट रूप से पीड़ित माना जाएगा. ऐसे मामलों में न्यायालय आरोपी को पीड़ित को क्षतिपूर्ति देने का आदेश दे सकता है. इसका भी प्रावधान किया गया है. इस अधिनियम के तहत मामलों की जांच उप निरीक्षक या उससे वरिष्ठ अधिकारी द्वारा की जाएगी. ऐसे मामलों में प्रमाण का भार आरोपी पर होगा. मामलों की सुनवाई के लिए निर्धारित न्यायालयों को अधिसूचित किया जाएगा.

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