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CG : जिनवाणी को पढ़ना नहीं, जीवन में उतारना जरूरी : मुनि पुनीत सागर …

By kadwaghut|31 Aug 2026, 1:29 PM
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रायपुर । दिगंबर जैन आदीश्वरधाम नवोदय तीर्थ में आयोजित समयोपदेश वर्षायोग 2026 के तहत रविवार को विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम भक्तिमय वातावरण में संपन्न हुए। मुनि आगम सागर जी महाराज एवं मुनिश्री ससंघ के पावन सानिध्य में अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, आहारचर्या, स्वाध्याय कक्षाओं और मंगल देशना का आयोजन हुआ।

प्रातःकाल मूलनायक भगवान का अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया गया। मुख्य शांतिधारा का सौभाग्य जगदलपुर निवासी श्रेयांश कुमार एवं सुनीता जैन परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं सनत कुमार जैन, अनिल कुमार जैन, मनोज कुमार जैन एवं रोमिल जैन परिवार ने मूलनायक भगवान के अभिषेक एवं शांतिधारा का पुण्यार्जन किया।

जिनवाणी को पढ़ना नहीं, जीवन में उतारना जरूरी
धर्मसभा में मुनि पुनीत सागर जी ने श्रद्धालुओं को तत्त्वार्थ सूत्र का अध्ययन कराया, जबकि मुनि आगम सागर जी ने छह ढाला की कक्षा के माध्यम से धर्म और आत्मकल्याण का मार्ग समझाया।

मंगल देशना में मुनि आगम सागर जी ने कहा कि केवल पूजा-पाठ करना ही धर्म नहीं है। पूजा मन को कुछ समय के लिए सांसारिक प्रपंचों से दूर कर भगवान की शरण में ले जाती है, लेकिन वास्तविक धर्म क्षमा और दया के चरण में है।

उन्होंने कहा कि जिनवाणी का अंतर्मन में उतरना अत्यंत दुर्लभ है। जो व्यक्ति विनयपूर्वक जिनवाणी को अपने जीवन में धारण करता है, उसका प्रभाव केवल वर्तमान जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आगामी भवों को भी श्रेष्ठ बनाने वाला होता है। स्वाध्याय तभी सार्थक है, जब उसके माध्यम से जीवन और आचरण में परिवर्तन आए।

भगवान राम के जीवन से समझाया जिनवाणी का प्रभाव
मुनिश्री ने जैन दर्शन के संदर्भ में भगवान रामचंद्र जी के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि पूर्व जन्मों में जिनवाणी के अमृत रस का पान करने के कारण उनकी कषायें मंद हुई थीं। उन्होंने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ में उलझा व्यक्ति आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त नहीं कर सकता।

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गाय का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि गाय साधारण घास-फूस खाकर भी मीठा दूध देती है। उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव विपरीत परिस्थितियों में रहते हुए भी समाज को कल्याणकारी विचार देने का प्रयास करता है।

उन्होंने बताया कि जैन धर्म के अनुसार रामचंद्र जी अत्यंत योग्य महापुरुष और आठवें बलभद्र माने गए हैं। राम और लक्ष्मण के जीवन में भाई-भाई के प्रेम का उदाहरण देखने को मिलता है।

विशाल हृदय ही बनाता है व्यक्ति को महान
मुनिश्री ने राम के जीवन से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से त्याग, प्रेम और विशाल दृष्टि का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के अंतरंग में यह भावना स्थापित हो जाती है कि जो मेरा है, वही मेरे भाई का है, उसका हृदय विशाल हो जाता है।

उन्होंने माता सीता के समर्पण का उल्लेख करते हुए कहा कि सीता जी ने हर परिस्थिति में राम का साथ निभाया। उनके त्याग और समर्पण के कारण ही लोकजीवन में राम से पहले सीता का नाम लेकर ‘सीता-राम’ कहा जाता है।

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि धर्म को केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित न रखें, बल्कि जिनवाणी के सिद्धांतों को अपने व्यवहार और आचरण का हिस्सा बनाएं। यही जीवन के वास्तविक निर्माण का मार्ग है।

आहारचर्या में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन
वर्षायोग के दौरान मुनि संघ को आहारदान का सौभाग्य विभिन्न परिवारों को प्राप्त हुआ। मुनि आगम सागर जी को श्रीमती सरोज एवं प्रमोद जैन परिवार, मुनि पुनीत सागर जी को श्रीमती ऊषा एवं धर्मचंद गंगवाल तथा एलक धैर्य सागर जी को महेंद्र कुमार जैन ने आहारदान कराया।

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‘3rd Eye’ कक्षा और स्वाध्याय का भी हुआ आयोजन
दोपहर में मुनि पुनीत सागर जी के सानिध्य में ‘3rd Eye’ यानी अंतर्ज्ञान चक्षु कक्षा का आयोजन किया गया। इसके बाद मुनिश्री ससंघ की दिव्य देशना हुई। सायंकाल सकल जैन समाज के लिए भव्य वात्सल्य भोज का आयोजन किया गया। रात में एलक धैर्यसागर जी के सानिध्य में तत्त्वार्थ सूत्र की विशेष स्वाध्याय कक्षा हुई।

150 तपस्वियों का सम्मान
समयोपदेश वर्षायोग के दौरान संपन्न 22 दिवसीय गिरनार नेमी तप के अवसर पर 28 अगस्त को 150 तपस्वियों का सामूहिक पारणा कराया गया। लाभार्थी परिवार की ओर से तपस्वियों का तिलक, माला और श्रीफल से सम्मान किया गया। चातुर्मास समिति की ओर से तप की स्मृति में सभी तपस्वियों को उपहार भी भेंट किए गए। श्रद्धालुओं ने कठिन साधना के लिए तपस्वियों की अनुमोदना करते हुए मंगलकामनाएं व्यक्त कीं।

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