राजनांदगांव : जब मन से धर्म से जुड़ेंगे तो सकारात्मक परिणाम दिखने लगेंगे : साध्वी आज्ञांजना…
डोंगरगांव , शांतिनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर की धर्मसभा में नियमित प्रवचन के दौरान साध्वी आज्ञांजना जी मसा ने मंगलवार को कहा कि दीपावली पर हम घर की सफाई पूरी शिद्दत से करते हैं और सफाई के बाद मन प्रसन्नता से भर जाता है। ठीक उसी प्रकार चातुर्मास आत्मरंजन व आत्मशुद्धि का पर्व है। आत्मा में जमा कचरे को बाहर निकालने के लिए परमात्मा की भक्ति और धर्म आराधना में लीन होना होगा, तभी जीवन रूपी नैया भवसागर से पार हो सकेगी।
श्रावक के करने योग्य 36 कर्तव्यों में तीसरे कर्तव्य सम्यक्त्व की व्याख्या करते हुए इसके पांच लक्षण सम, संवेग, निर्वेद, अनुकंपा और आस्तिक्य बताए। उन्होंने सम के संदर्भ में क्षमा, यति और समता का भाव रखने की प्रेरणा दी। कहा कि हर परिस्थिति में समता बनाए रखना चाहिए। परमात्मा पार्श्वनाथ ने उपसर्ग करने वाले मेघमाली (कमठ) और भक्ति करने वाले धरणेंद्र, दोनों के प्रति समान भाव रखा। अनेक भावों में कष्ट देने वाले कमठ को भी परमात्मा ने सम्यक दर्शन का उपहार दिया। कहा कि चातुर्मास धर्म आराधना का पर्व है। इसे श्रद्धा, भक्ति, उल्लास और पुरुषार्थ के साथ अपनाना चाहिए। भावना और उल्लास धर्म आराधना को मजबूत करते हैं। जब मन से धर्म से जुड़ेंगे तो उसके सकारात्मक परिणाम स्वतः दिखाई देने लगेंगे।
बड़ों को जवाब न देने का संकल्प लें: मसा ने राजा श्रेणिक का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि पुत्र कोणिक द्वारा जेल में डाल दिए जाने और प्रतिदिन कष्ट सहने के बावजूद श्रेणिक महाराज के मन में पुत्र के प्रति जरा भी द्वेष नहीं आया। वे भगवान महावीर स्वामी के परम भक्त थे और जिनवाणी को केवल सुनते नहीं, बल्कि अपने रोम-रोम में उतार चुके थे। परमात्मा का स्मरण करते हुए उन्होंने हर कष्ट को समता भाव से सहन किया। हम ऐसे कठिन उपसर्ग नहीं झेलते, लेकिन बड़ों की सलाह अथवा डांट सुननी पड़े तो उसे भी समता से स्वीकार करें और बड़ों को जवाब न देने का संकल्प लें।
असफलता कहीं न कहीं पुरुषार्थ की प्रेरणा देती है: साध्वी आगमरूचि जी मसा ने कहा कि असफलता मिलने पर निराश होने की आवश्यकता नहीं है। असफलता कहीं न कहीं पुरुषार्थ की प्रेरणा देती है और सफलता की उस सीढ़ी तक पहुंचाती है, जहां कामयाबी का बिगुल बजता है। माता-पिता और बच्चों, शिक्षक और विद्यार्थी तथा गुरु और शिष्य के संबंधों को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इन रिश्तों में श्रद्धा और समर्पण का भाव हो तो उसका सकारात्मक प्रभाव परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र तक दिखाई देता है।




