राजनांदगाव , ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन के तहत मंगलवार को मुनि समयप्रभ सागर जी ने कहा कि अहंकार और अंधकार को दूर करता है ज्ञान और ज्ञान हमारे ग्रंथों में है जिसे आत्मसात करें तो आत्म कल्याण अवश्य होगा। कहा कि अहंकार व्यक्ति का पतन कर देता है। अहंकार का त्याग करना चाहिए। कहा कि कब कैसे पापों का उदय हो जाए किसी को पता नहीं चलता। अहंकार हमें अंधकार की ऒर ले जाता है और हमारी सोच समझ को खत्म कर देता है। आप कृतज्ञ बनो, कृतघ्न मत बनो।
कृतज्ञ व्यक्ति अपने माता-पिता के पालन पोषण का आभार व्यक्त करता है और उनका सम्मान करता है, जबकि कृतघ्न व्यक्ति आभार नहीं मानता। अहंकारी व्यक्ति हमेशा कृतघ्न होता है। मां-बाप को वृद्ध आश्रम में छोड़ने वाले व्यक्ति इसी श्रेणी में आते हैं। अपनों से दूर होना काफी दर्द पहुंचाता है।
अपनापन दर्द को काफी कम कर देता है। कहा कि हम बच्चों में विनय की शिक्षा डालते ही कब हैं और जब हम विनय की शिक्षा ही नहीं डाले तो फिर बच्चों के विनयशील बनने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। मुनि ने कहा कि हमारी पीढ़ी तो ठीक है किंतु उनके आगे की पीढ़ी का क्या होगा? गलती हमारी ही है कि हमने अपने बच्चों के लिए समय नहीं निकाला। पहली सीढ़ी चढ़ोगे तब ही दूसरी सीढ़ी चढ़ पाओगे। हम इन ग्रंथों के जरिए भी आत्मावस्था को प्राप्त कर सकते हैं।
हर जगह सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश नहीं पहुंच सकता किंतु दीपक का प्रकाश हर जगह पहुंचाया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार हमारे ग्रंथ दीप के समान है जिनके माध्यम से हम ज्ञान को और परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं। हम ग्रंथों को आत्मसात करें तो बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। लचीलापन बनाए रखने के लिए ज्ञान आवश्यक है। ज्ञान का सदुपयोग भी हो सकता है और दुरुपयोग भी, इसका हमें किस तरह उपयोग करना है, यह हम पर ही निर्भर है।
