शांतिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर में चातुर्मास में आयोजित नियमित प्रातःकालीन धर्मसभा में विराजित साध्वी आज्ञांजना जी मसा ने कहा कि धर्म से जुड़ने के लिए सबसे पहले उसके प्रति प्रेम जागृत होना आवश्यक है। जब तक मन में श्रद्धा, आकर्षण और अपनत्व का भाव नहीं होगा, तब तक धर्म की आराधना में स्थिरता और लगन नहीं आ सकती। कहा कि परमात्मा से सच्चा संबंध स्वार्थ या मनोकामनाओं से नहीं, बल्कि निष्कपट भक्ति और आत्मसमर्पण से बनता है।
जैसे किसी नए व्यक्ति से परिचय धीरे-धीरे बढ़ता है और उसके गुणों को जानने के बाद ही प्रेम और विश्वास का संबंध बनता है, उसी प्रकार धर्म को भी पहले समझना और उसके गुणों को आत्मसात करना आवश्यक है। केवल औपचारिक रूप से धर्म से जुड़ने से आत्मिक परिवर्तन संभव नहीं होता। कहा कि आज की पीढ़ी शिक्षित तो है, लेकिन धर्म के प्रति प्रश्न अधिक और अभ्यास कम है।
धर्म करने के लिए कारण पूछा जाता है, जबकि पापकर्म करते समय मन कोई प्रश्न नहीं करता। पहले के लोग गुरु भगवंतों की वाणी को श्रद्धा से सुनकर जीवन में उतारते थे। बचपन में प्राप्त संस्कार ही आगे चलकर व्यक्ति के आचरण और व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। कहा कि आज अधिकांश लोग धर्म में भी तत्काल फल की अपेक्षा रखते हैं। मनुष्य चाहता है कि उसकी मनोकामनाएं तुरंत पूरी हो जाएं, जबकि आध्यात्मिक साधना धैर्य, विश्वास और निरंतर पुरुषार्थ का मार्ग है।
