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सलूंबर स्वास्थ्य संकट: विशेषज्ञों ने मलेरिया और वायरल एन्सेफलाइटिस की जताई आशंका

By Admin|13 Apr 2026, 7:41 PM
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सलूंबर

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सलूंबर जिले में 8 दिन के भीतर 8 बच्चों की मौत की वजह अभी तक स्पष्ट नहीं हुई है. घाटा और झल्लारा में कुछ दिनों के भीतर बच्चों की मौत का रहस्य बरकरार है. फिलहाल, इस बारे में वजह का खुलासा नहीं हुआ है. खास बात यह है कि कुछ मरीजों के सैंपल पुणे स्थित नेशनल वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट में भी भेजे गए थे. उसके बाद वायरस के बारे में स्पष्ट जानकारी मिल पाएगी. हालांकि, स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में अब तक जो बात सामने आई, उसके तथ्यों का विश्लेषण करते हुए NDTV ने विशेषज्ञ चिकित्सक और स्थानीय डॉक्टरों से बातचीत की. इस दौरान कुछ संभावनाओं की बात सामने आई, जो मौत की वजह हो सकती है. इस रिपोर्ट में बात इन्हीं संभावनाओं पर…

हॉस्पिटल की जांच रिपोर्ट में ये बातें आई सामने
इसमें जापानी इंसेफेलाइटिस (Japanese Encephalitis) और चांदीपुरा वायरस (Chandipura virus) की आशंका जताई जा रही थी. स्वास्थ्य विभाग द्वारा 20 बच्चों के सैंपल की जांच कराई गई थी. उदयपुर स्थित एमबी हॉस्पिटल के अधीक्षक आरएल सुमन ने बताया कि जापानी इंसेफेलाइटिस की रिपोर्ट निगेटिव आई है. जबकि अन्य वायरस का पता लगाने के लिए सैंपल पुणे भेजे गए थे. फिलहाल यह रिपोर्ट स्वास्थ्य घाटा गांव और आसपास के इलाकों में 1 से 5 अप्रैल के बीच बच्चों की मौत हुई थी. इन बच्चों में बुखार, दौरे और इंसेफेलाइटिस जैसे लक्षण दिखे थे. डॉ. आरएल सुमन के मुताबिक, "झल्लारा गांव के 3 बच्चे हॉस्पिटल में रेफर हुए थे, उनमें से एक को मलेरिया था, उपचार करने के बाद दो दिन पहले डिस्चार्ज दे दिया था. इनके अलावा बाकी की रिपोर्ट में कोई गंभीर बात सामने नहीं आई थी."

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रैपिड रिस्पॉन्स टीम को क्या लक्षण मिले?
    शाम या रात में हल्की उल्टी और दस्त शुरू होते थे.
    उसके बाद अचानक शरीर में अकड़न (stiffness) आती थी.
    बच्चा बेहोश हो जाता था और फिर होश नहीं आता था.
    मौत 24 से 48 घंटे के अंदर हो जाती थी.
    ज्यादातर मामलों में बुखार की हिस्ट्री नहीं मिली.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) डॉ. लाखन पोसवाल (एक्सपर्ट) से खास बातचीत में स्वास्थ्य विभाग की स्क्रीनिंग में मिले लक्षणों से जुड़े सवाल-जवाब किए. उन्होंने कहा कि बीमारी का स्पष्ट बता पाना संभव नहीं है. लेकिन, आदिवासी अंचल में मलेरिया, ब्रुसेलोसिस और वायरल एन्सेफलाइटिस (दिमागी बुखार/वायरल इनफेक्शन) का प्रकोप हमेशा से रहा है. स्पष्ट तौर पर इसकी पहचान के लिए पुणे लैब की रिपोर्ट का इंतजार करना होगा.

उन्होंने बताया कि बीमार होने के बाद जिस तरह से कम ही समय में बच्चों की मौत हुई, उससे ब्रुसेलोसिस की संभावना काफी कम है. क्योंकि यह बीमारी धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित करती है. इससे इतनी तेजी (24-48 घंटे) में मौत होना काफी मुश्किल है. इसलिए इसकी संभावना कम मानी जा रही है.

    डॉ. पोसवाल के मुताबिक, "पहली संभावना है कि मलेरिया (खासकर सेरेब्रल मलेरिया) का दिमाग पर सीधा असर हुआ हो. इलाके में पहले से प्रचलित बीमारियों को देखते हुए मलेरिया सबसे ज्यादा संभावित लगता है. दूसरी संभावना है कि वायरल एन्सेफलाइटिस (दिमागी बुखार/वायरल इनफेक्शन) की वजह से मौत हुई हो."

साथ ही ध्यान देने वाली बात यह है कि मलेरिया में कई बार एंटीजन टेस्ट किट निगेटिव आ सकता है, भले ही संक्रमण हो (फॉल्स नेगेटिव). इसलिए नेगेटिव रिपोर्ट आने के बावजूद मलेरिया को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.
जनजाति क्षेत्र में चुनौतियां भी कम नहीं

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लेकिन, इस तरह मौतों का मामला जनजाति अंचल में कोई नई बात नहीं है. बीते कुछ सालों का पैटर्न एक जैसा ही है, जनजाति क्षेत्र में ऐसी बीमारी का मामला सामने आता है और फिर वो एक नए वायरस की बात का खुलासा होता है. जुलाई 2024 में उदयपुर में चांदीपुरा वायरस (CHPV) के मामलों ने चिंता बढ़ा दी थी. खास तौर पर गुजरात की सीमा से लगे आदिवासी क्षेत्रों (खेरवाड़ा, नयागांव) में 15 साल से कम उम्र के बच्चों में इसके लक्षण देखे गए. यह वायरस बुखार, उल्टी और मतिभ्रम (altered sensorium) का कारण बनता है. हालांकि, उस दौरान मृत बच्चे सहित 3 बच्चों के पुणे भेजे गए नमूनों की रिपोर्ट निगेटिव आई थी.

साक्षरता की कमी, स्वास्थ्य देखभाल और पोषण के बारे में सीमित जानकारी और खराब आहार जैसी तमाम वजह भी इस क्षेत्र में बड़ी चुनौतियां हैं. यही वजह है कि कई ग्रामीण बीमारी को मानने से इनकार कर रहे हैं. जांच के लिए पहुंची चिकित्सा टीमों को भी ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा.

 

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