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राजनांदगांव : बुढ़ासागर में 17 करोड़ का सौंदर्यीकरण, फिर भी सवालों का दलदल कायम!

By kadwaghut|31 Aug 2026, 4:03 PM
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60 लाख का वाटरफॉल बना ‘सूखा स्मारक’, कार्रवाई हुई तो जिम्मेदारी आखिर तय क्यों नहीं हुई?

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राजनांदगांव। शहर के विकास और बुढ़ासागर तालाब को आकर्षक पर्यटन स्थल बनाने के नाम पर करीब 16 से 17 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन वर्षों बाद भी इस परियोजना से जुड़े कई सवाल शहर के सामने जस के तस खड़े हैं। सबसे ज्यादा चर्चा उस कृत्रिम वाटरफॉल की रही, जिस पर करीब 60 लाख रुपये खर्च किए जाने की बात सामने आई, लेकिन पानी बहने के बजाय आज वहां अधूरापन और विवादों की कहानी दिखाई देती है।

लाखों का वाटरफॉल, लेकिन पानी कहां?

दिग्विजय कॉलेज की बाहरी दीवार से लगे कृत्रिम वाटरफॉल को बुढ़ासागर की सुंदरता बढ़ाने और शहर के लिए नया आकर्षण बनाने की योजना का हिस्सा बताया गया था। निर्माण हुआ, ढांचा खड़ा हुआ, लेकिन उसका उद्देश्य कितना पूरा हुआ—यह सवाल आज भी शहर में पूछा जाता है।

निर्माण के बाद दीवारों में दरार आने और गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आई थीं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि निर्माण तय उपयोगिता के अनुरूप संचालित ही नहीं हो पाया, तो गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान किस आधार पर किया गया?

जांच समिति बनी, दो इंजीनियर निलंबित हुए… फिर आगे क्या?

बुढ़ासागर सौंदर्यीकरण को लेकर विवाद बढ़ने के बाद नगर निगम की सामान्य सभा में तीन कांग्रेस और तीन भाजपा पार्षदों की छह सदस्यीय जांच समिति गठित की गई थी।

समिति की रिपोर्ट के बाद तत्कालीन सहायक अभियंता और उप-अभियंता के निलंबन की कार्रवाई हुई थी। एक वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच की बात भी सामने आई। संबंधित ठेकेदार पर करीब 5 लाख रुपये जुर्माना लगाने और ब्लैकलिस्ट करने के लिए नोटिस जारी किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी।

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लेकिन वर्षों बाद सवाल यह है कि इन कार्रवाइयों का अंतिम परिणाम क्या निकला?

निलंबित अधिकारी बहाल हो गए तो जांच में अंतिम रूप से क्या पाया गया? विभागीय जांच कहां तक पहुंची? ठेकेदार के खिलाफ ब्लैकलिस्टिंग का क्या हुआ? और यदि एफआईआर की मांग पर सहमति बनी थी तो मुकदमा दर्ज हुआ या नहीं?

क्या पूरी जिम्मेदारी सिर्फ दो इंजीनियरों की थी?

करोड़ों रुपये की किसी भी सरकारी या नगरीय परियोजना में केवल एक-दो कर्मचारियों की भूमिका नहीं होती।

टेंडर से लेकर तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश, निर्माण की निगरानी, माप पुस्तिका, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान तक अलग-अलग स्तर पर अधिकारी और एजेंसियां जिम्मेदार होती हैं।

इसलिए सवाल सिर्फ इतना नहीं कि दो इंजीनियर निलंबित हुए या नहीं।

सवाल यह है कि पूरी प्रक्रिया में किस-किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई?

यदि निर्माण में गंभीर तकनीकी खामियां थीं तो उन्हें समय रहते क्यों नहीं पकड़ा गया? और यदि पकड़ा गया तो भुगतान रोकने अथवा राशि की वसूली की दिशा में क्या कार्रवाई हुई?

बुढ़ासागर की मिट्टी का हिसाब भी बने सार्वजनिक

बुढ़ासागर तालाब के गहरीकरण के दौरान निकली मिट्टी और उसकी ढुलाई भी उस समय सवालों के घेरे में रही थी।

करीब 5 करोड़ रुपये के मिट्टी खनन और परिवहन से जुड़े खर्च को लेकर यह सवाल उठाया गया कि तालाब से वास्तविक रूप से कितनी मिट्टी निकाली गई, कितने वाहनों से उसका परिवहन हुआ, उसे कहां डाला अथवा उपयोग किया गया और रिकॉर्ड में कितनी मात्रा दर्ज है?

वाहन और परिवहन संबंधी दस्तावेजों की जांच में कथित खामियों की बातें भी सामने आई थीं।

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ऐसे में नगर निगम को यह साफ करना चाहिए कि मिट्टी के उत्खनन, परिवहन, उपयोग और भुगतान का पूरा रिकॉर्ड क्या कहता है।

ठेकेदार पर एफआईआर की बात हुई थी तो मुकदमा कहां है?

सामान्य सभा में संबंधित ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने और एफआईआर दर्ज कराने की मांग पर सहमति बनने की बात सामने आई थी।

इसके बाद राजनीतिक दलों ने आंदोलन भी किए। आरोप लगे, प्रदर्शन हुए और कार्रवाई के दावे भी हुए।

लेकिन जनता का सीधा सवाल आज भी वही है—

एफआईआर दर्ज हुई या नहीं?

यदि हुई तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?

और यदि नहीं हुई तो सामान्य सभा में उठे मामले तथा जांच रिपोर्ट के बाद भी एफआईआर क्यों नहीं कराई गई?

कड़वा सवाल—17 करोड़ खर्च हुए तो शहर को मिला क्या?

बुढ़ासागर सौंदर्यीकरण का मामला केवल एक बंद पड़े वाटरफॉल का मामला नहीं है।

यह सवाल है सार्वजनिक धन, तकनीकी निगरानी, प्रशासनिक जवाबदेही और ठेकेदारी व्यवस्था का।

अब नगर निगम और जिम्मेदार विभागों को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि—

👉 परियोजना की वास्तविक स्वीकृत लागत कितनी थी और कुल भुगतान कितना हुआ?

👉 60 लाख के कृत्रिम वाटरफॉल का डिजाइन और तकनीकी स्वीकृति किसने दी?

👉 निर्माण गुणवत्ता की जांच किस अधिकारी अथवा एजेंसी ने की?

👉 वाटरफॉल नियमित रूप से शुरू नहीं हुआ तो भुगतान किस आधार पर हुआ?

👉 तालाब से वास्तविक रूप से कितनी मिट्टी निकाली गई?

👉 मिट्टी ढुलाई में कितने वाहन लगे और उसका रिकॉर्ड क्या है?

👉 दो इंजीनियरों के अलावा अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच हुई या नहीं?

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👉 ठेकेदार पर लगाए गए जुर्माने और ब्लैकलिस्टिंग नोटिस का अंतिम परिणाम क्या हुआ?

👉 एफआईआर दर्ज हुई या नहीं? नहीं हुई तो क्यों?

कड़ुवा घूंट का सवाल सीधा है—करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद जनता को केवल दीवारें, ढांचे और फाइलों में बंद जांच नहीं चाहिए। जनता को हर रुपये का हिसाब और जिम्मेदारी का अंतिम निष्कर्ष चाहिए।

वरना शहर और तालाबों के सौंदर्यीकरण के नाम पर योजनाएं बनती रहेंगी, करोड़ों खर्च होते रहेंगे और विकास की तस्वीर देखकर राजनांदगांव अपने ही विकास के आंसू बहाता रहेगा।

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