मध्य प्रदेशराज्‍य

बंगला पान किसानों के लिए खुशखबरी! 10 जिलों में खेती को मिलेगा बढ़ावा, निर्यात पर फोकस

By Admin|30 May 2026, 9:42 AM
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प्रदेश के बंगला पान की महक पड़ोसी देशों तक

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पान की खेती को प्रोत्साहित करने 10 जिलों के लिये बनी विशेष कार्य योजना

भोपाल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश में किसान कल्याण के लिये निरंतर कार्य किये जा रहे। इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे है। आज मध्यप्रदेश का पान अपनी विशिष्ट सुगंध, कोमलता और स्वाद के कारण देश ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। प्रदेश के छतरपुर, रीवा, मंदसौर, नरसिंहपुर और टीकमगढ़ जैसे जिलों में पान की खेती वर्षों से की जा रही है, जो आज किसानों की आय का एक मजबूत आधार बनती जा रही है। विशेष रूप से छतरपुर का “बंगला पान” अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है, जिसकी मांग पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका तक फैली हुई है।

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पान की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष कार्य योजना लागू की गई है, जिसके तहत 10 जिलों को शामिल करते हुए 1 करोड़ 3 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना में किसानों को प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, उन्नत किस्मों की रोपाई सामग्री और बरोज निर्माण के लिए सहायता प्रदान की जा रही है।

छतरपुर में उगाया जाने वाला बंगला पान अपनी पतली बनावट, हल्की मिठास और लंबे समय तक ताजगी बनाए रखने की क्षमता के कारण निर्यात के लिए उपयुक्त माना जाता है। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर रीवा जिले के महसांव क्षेत्र के 2 गांवों में उत्पादित पान की पहचान भी विशेष है। यहां का पान उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों—वाराणसी, प्रयागराज और लखनऊ—तक बड़े पैमाने पर भेजा जाता है, वहां इसे अत्यंत पसंद किया जाता है।

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मध्यप्रदेश में पान की खेती मुख्यतः चौरसिया समाज द्वारा परंपरागत रूप से की जाती रही है। यह समाज पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़ा है और अपने अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर उच्च गुणवत्ता का पान तैयार करता है। पान की खेती में “बरोज” नामक संरक्षित ढांचे का उपयोग किया जाता है, जिसमें तापमान और नमी को नियंत्रित कर पौधों की विशेष देखभाल की जाती है। यह प्रक्रिया श्रमसाध्य होती है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप उत्कृष्ट गुणवत्ता का पान प्राप्त होता है।

वर्तमान समय में पान उत्पादकों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से पान मसाला और गुटखा जैसे उत्पादों के बढ़ते प्रचलन ने पारंपरिक पान की मांग को प्रभावित किया है। युवा पीढ़ी में इन उत्पादों की ओर झुकाव बढ़ने से पान की खपत में कुछ कमी आई है, जिससे किसानों की आय पर भी असर पड़ा है। इसके बावजूद, पारंपरिक पान की सांस्कृतिक और धार्मिक उपयोगिता आज भी बनी हुई है, जो इसकी स्थिर मांग को बनाए रखती है।

पान का भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान है। यह न केवल स्वाद और ताजगी का प्रतीक है, बल्कि पूजा-पाठ, विवाह समारोह और अतिथि सत्कार में भी इसका महत्वपूर्ण उपयोग होता है। इस सांस्कृतिक महत्व के कारण पान की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है।

मध्यप्रदेश का पान न केवल स्थानीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान बना रहा है। यदि पान उत्पादकों को उचित प्रोत्साहन, विपणन सुविधा और जागरूकता मिले, तो यह क्षेत्र प्रदेश की अर्थव्यवस्था को और अधिक सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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