मध्य प्रदेश

बाघों के शिकार पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नजर, MP-महाराष्ट्र को 4 हफ्ते में देना होगा जवाब

By Admin|18 Sep 2025, 12:42 PM
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भोपल 

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सुप्रीम कोर्ट ने  केंद्र सरकार, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और अन्य से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कथित संगठित बाघ शिकार और अवैध वन्यजीव व्यापार रैकेट की सीबीआइ जांच की मांग की गई है।

भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) बीआर गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ वकील गौरव कुमार बंसल द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें सक्रिय संगठित शिकार गिरोहों द्वारा बाघों के लिए उत्पन्न गंभीर खतरे पर प्रकाश डाला गया था। बंसल ने कहा कि कम से कम 30 प्रतिशत बाघ निर्दिष्ट बाघ अभयारण्यों के बाहर हैं और उन्होंने बाघों के बड़े पैमाने पर शिकार की खबरों का हवाला दिया।

इन बिंदुओं पर दायर हुई है याचिका

महाराष्ट्र सरकार की एसआईटी जांच में शिकारी, तस्करों और हवाला नेटवर्क का संगठित गिरोह सामने आया। यह गिरोह बाघों की खाल, हड्डियां और ट्रॉफी को राज्य की सीमाओं से बाहर और विदेशों तक तस्करी करता है।

याचिका में रिपोर्ट का हवाला देकर कहा गया है कि बाघों का शिकार अब संरक्षित क्षेत्रों से बाहर वन प्रभागों और कॉरिडोर में ज्यादा हो रहा है, जहां निगरानी और सुरक्षा बेहद कमजोर है। वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) ने इन क्षेत्रों को बाघों के फैलाव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है।

बाघों के अंगों की तस्करी में लगे एक अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के पर्दाफाश

पीठ ने केंद्र एवं अन्य प्राधिकारियों की ओर से अदालत में पेश हुईं अतिरिक्त सालिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से याचिका पर निर्देश लेने को कहा। याचिका में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बाघों के व्यवस्थित शिकार और राज्यों एवं म्यांमार तक फैले बाघों के अंगों की तस्करी में लगे एक अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के पर्दाफाश का हवाला दिया गया है।

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याचिका में कहा गया है, ''कई आरोपितों की गिरफ्तारी, बाघों की खाल, हड्डियां, हथियार और वित्तीय रिकार्ड की जब्ती, साथ ही एसआइटी के गठन से यह स्पष्ट हो गया है कि यह समस्या किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गहरे आपराधिक नेटवर्क के अस्तित्व को दर्शाती है जो कानून के शासन को कमजोर करता है।''
बाघ अभयारण्यों से सटे गैर-संरक्षित प्रादेशिक वन शिकारियों के आसान शिकार

याचिका में यह भी कहा गया है कि अधिसूचित बाघ अभयारण्यों से सटे गैर-संरक्षित प्रादेशिक वन क्षेत्र बार-बार शिकारियों का आसान निशाना बन गए हैं। इसके फलस्वरूप कार्रवाई करने की वजहें और भी मजबूत हो जाती हैं।

सीबीआइ जांच की मांग करते हुए याचिका में कहा गया है, ''जब तक यह अदालत हस्तक्षेप नहीं करती और एक व्यापक, स्वतंत्र और समन्वित जांच का निर्देश नहीं देती, तब तक राष्ट्र की पारिस्थितिक सुरक्षा और राष्ट्रीय पशु के अस्तित्व को गंभीर खतरा रहेगा।''

याचिका में यह भी कहा गया है, ''प्रतिवादियों (केंद्र और अन्य) को एसआइटी की सिफारिशों को तुरंत लागू करने और बाघ अभयारण्यों से सटे बाघ गलियारों और प्रादेशिक वन प्रभागों में प्रभावी सुरक्षा, निगरानी और गश्त बढ़ाने का निर्देश दिया जाए, और उन्हें मुख्य क्षेत्रों के समान माना जाए।'' याचिका में केंद्रीय गृह मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) और एनटीसीए को पक्ष बनाया गया है।

बंसल ने अदालत में कहा

याचिकाकर्ता के वकील बंसल ने कहा कि भारत में 30% से अधिक बाघ संरक्षित क्षेत्रों के बाहर पाए जाते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि तस्करी का यह संगठित नेटवर्क वन गुर्जर समुदाय जैसे आदिवासी समूहों से जुड़े गिरोहों को भी शामिल करता है। उन्होंने अदालत से मांग की कि इस मामले की सीबीआई जांच कराई जाए।

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