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जेएसएससी भर्ती विवाद पर हाई कोर्ट की टिप्पणी, जून तक जारी करें रिजल्ट

By Admin|07 May 2026, 9:51 PM
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 रांची

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झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने माध्यमिक आचार्य नियुक्ति विवाद में महत्वपूर्ण सुनवाई की। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रार्थी और अन्य सभी 2819 अभ्यर्थी अगर चाहें तो 8 और 9 मई को होने वाली पेपर-2 की पुनर्परीक्षा में शामिल हो सकते हैं। अदालत ने फिलहाल पुनर्परीक्षा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

हाई कोर्ट में माध्यमिक आचार्य नियुक्ति विवाद से संबंधित याचिका पर गुरुवार को सुनवाई के दौरान प्रार्थियों ने पुनर्परीक्षा पर रोक लगाने का आग्रह किया था। लेकिन अदालत ने उन्हें अंतरिम राहत नहीं दी। अदालत ने कहा कि परीक्षार्थी चाहें तो उक्त परीक्षा में शामिल हो सकते हैं।

ऐसे में अब प्रार्थियों सहित सभी 2819 अभ्यर्थी आठ और नौ मई को प्रस्तावित पेपर-2 की पुनर्परीक्षा में शामिल होना होगा। सुनवाई के दौरान सरकार और जेएसएससी की ओर से अदालत को बताया गया कि परीक्षा में 24 हजार परीक्षार्थी शामिल हुए, यह परीक्षा कंप्यूटर आधारित थी।

2819 अभ्यर्थी के आइपी एड्रेस में हैकिंग पाई गई थी, जिसके कारण जेएसएससी ने इनकी पुनर्परीक्षा आठ व नौ मई को लिए जाने का निर्देश दिया। इन सभी अभ्यर्थियों को एडमिट कार्ड भी जारी कर दिया गया।

अदालत ने प्रार्थियों के पुनर्परीक्षा पर रोक से संबंधित मांग को अस्वीकार करते हुए प्रार्थियों को निर्देश दिया कि वह चाहें तो पुनर्परीक्षा में शामिल हो सकते हैं। अदालत ने राज्य सरकार और जेएसएससी को इस वर्ष जून माह तक परिणाम जारी करने का निर्देश भी दिया है।

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इस संबंध में अर्चना कुमारी और अन्य की ओर से मामले में याचिका दायर की है। जिसमें जेएसएससी को माडल आंसर दिखाने का आदेश देने का मूल आग्रह किया है ताकि वह माडल आंसर के विरुद्ध आपत्ति दे सकें।

लेकिन संशोधन याचिका के माध्यम से प्रार्थियों ने जेएसएससी द्वारा जारी 23 अप्रैल 2026 को जारी नोटिस को चुनौती दी है। नोटिस के जरिए जेएसएससी ने 2819 अभ्यर्थियों, जिनमें 20 प्रार्थी भी शामिल हैं, को आठ मई 2026 को प्रस्तावित पेपर-2 की पुनर्परीक्षा में शामिल होने का निर्देश दिया है।

उनकी ओर से कोर्ट को बताया गया था कि बिना परीक्षा केंद्र के अधिकृत व्यक्तियों की पहचान किए और बिना दोषी अभ्यर्थियों को चिह्नित किए सभी 2819 अभ्यर्थियों को एक साथ पुनर्परीक्षा के लिए बाध्य करना अवैध और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

प्रार्थी किसी भी प्रकार के अनुचित साधनों में शामिल नहीं रहे हैं, लेकिन उन्हें भी दंडात्मक कार्रवाई के दायरे में लाया जा रहा है। आयोग को पहले कथित अनियमितताओं में शामिल परीक्षा केंद्र के अधिकृत व्यक्तियों और संबंधित अभ्यर्थियों की पहचान कर उनके विरुद्ध सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, न कि सभी अभ्यर्थियों को समान रूप से परेशान करना चाहिए

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