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UP में आउटसोर्स कर्मचारियों को बड़ी राहत, योगी सरकार ने उठाया अहम कदम; बदलेगी व्यवस्था

By Admin|03 Sep 2026, 2:05 PM
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आउटसोर्स कर्मियों के लिए गरिमा का नया अध्याय

लखनऊ 

समाज में पूरी गरिमा के साथ जीने का हर व्यक्ति को अधिकार है और नेतृत्व यदि संवेदनशील है तो इसे सुनिश्चित भी करता है। किसी कर्मचारी को गरिमा का अहसास तभी होता है जब उसे यह महसूस हो कि उसका परिश्रम सुरक्षित है, उसका परिवार सुरक्षित है और उसकी आवाज़ सुनी जाएगी। यह हर कर्मचारी का अधिकार है और यही वह मापदंड है, जिससे किसी भी सरकार की संवेदनशीलता का आकलन किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम (यूपीकॉस) का शुभारंभ कर आउटसोर्स कर्मियों की गरिमा लिखने का नया अध्याय शुरू किया है। आउटसोर्स कर्मी जो वर्षों से शासन-सत्ता के गलियारे में अपनी पहचान खोज रहा था, जो अब तक अनिश्चितता के वातावरण में अपना जीवन गुजार रहा था और जिसे यह विश्वास भी नहीं था कि कोई उसकी पीड़ा को सुनेगा। योगी सरकार में गठित हुआ उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम इसी पीड़ा को दूर करने का तंत्र और प्रयास है। 

2017 से पहले की सरकारों पर नज़र डालें तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है। उस दौर में आउटसोर्स कर्मचारियों को बोझ के रूप में देखा जाता था, संपत्ति के रूप में नहीं। जिन एजेंसियों को ठेके दिए जाते थे, उनमें से अधिकतर सत्ताधारी नेताओं के करीबियों और रिश्तेदारों के स्वामित्व वाली होती थीं। भर्ती प्रक्रिया से लेकर वर्दी और अन्य सुविधाओं तक में शोषण की शिकायतें आम थीं। यह एक ऐसा तंत्र था, जिसमें लाभ कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रहता था और पीड़ा उन तक पहुंचती थी, जो सबसे कमजोर स्थिति में खड़े थे। यह व्यवस्था कितनी बिखरी हुई थी, इसे इसकी संरचना से ही समझा जा सकता है। एक तरफ कार्मिक होता था, दूसरी तरफ एजेंसी, और तीसरी तरफ सरकारी विभाग। कर्मचारी जब भी किसी समस्या के साथ इनमें से किसी दरवाज़े पर दस्तक देता, उसे दूसरे दरवाज़े की ओर भेज दिया जाता। वेतन में देरी, ईपीएफ और ईएसआई की अनिश्चितता, और सेवा से जुड़े बुनियादी अधिकारों को लेकर व्याप्त असमंजस उसकी नियति थी। यह ऐसी संरचनात्मक उपेक्षा थी, जिसने लाखों परिवारों को अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल रखा था। 

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पंडित दीन दयाल उपाध्याय के अंत्योदय सिद्धातों को अपनी सोच में ढालने वाली योगी सरकार ने आउटसोर्स कर्मियों को बोझ नहीं, अपनी मानव संपत्ति के रूप में स्वीकार किया। यह वैचारिक परिवर्तन ही यूपीकॉस की आत्मा है। इसके तथ्यात्मक पक्ष को देखें तो इसकी गंभीरता और स्पष्ट होती है। साढ़े तीन लाख से अधिक आउटसोर्स कर्मियों को सीधा लाभ मिलेगा, लेकिन जब उनके परिवारों को भी जोड़ा जाए तो यह संख्या 17 से 20 लाख तक पहुंच जाती है। यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना के एक बड़े हिस्से के लिए जीवन बदलने वाला कदम है। हर महीने की पांच तारीख तक पारिश्रमिक सीधे बैंक खाते में पहुंचेगा, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त होगी और भुगतान में होने वाली देरी और गड़बड़ी पर भी अंकुश लगेगा।

इससे एक कदम आगे जाकर की गई व्यवस्था इस निर्णय को और मानवीय बनाती है। किसी घटना, दुर्घटना या आपदा की स्थिति में परिवार को 20 से 40 लाख रुपये तक का बीमा कवर मिलेगा। यह सुविधा उस असुरक्षा को दूर करती है, जो अब तक हर आउटसोर्स कर्मचारी के मन में एक स्थायी भय की तरह बसी रहती थी कि किसी अनहोनी की स्थिति में उसका परिवार असहाय हो जाएगा। ईपीएफ और ईएसआई का अंशदान भी अब सुनिश्चित किया जाएगा। सरकार आउटसोर्स एजेंसी को सर्विस चार्ज देगी, जिससे कर्मचारी के वेतन से कटौती नहीं होगी। यह प्रावधान सीधे तौर पर उस आर्थिक बोझ को कम करता है, जो पहले कर्मचारी अकेले वहन करता था।

नौकरी की सुरक्षा को लेकर भी इस व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। अब कोई एजेंसी किसी आउटसोर्स कर्मी को मनमाने ढंग से नौकरी से नहीं निकाल सकेगी। ऐसा करने से पहले सरकार को सूचित करना अनिवार्य होगा, और जांच के बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा। इससे किसी भी समय नौकरी जाने की आशंका समाप्त होती है। इसके साथ ही पारिश्रमिक अब किसी अधिकारी या एजेंसी की मर्ज़ी पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि कर्मचारी की श्रेणी और शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप तय होगा। यह पारदर्शिता कर्मचारी के आत्मसम्मान को पुनर्स्थापित करने वाला कदम है।

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सामाजिक सुरक्षा का दायरा केवल कर्मचारी तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसके परिवार को भी उसका लाभ मिलना चाहिए। पुत्र की शिक्षा के लिए आठ लाख रुपये तक और पुत्री की शिक्षा के लिए दस लाख रुपये तक की सहायता, दो पुत्रियों के विवाह के लिए आठ से दस लाख रुपये तक की सहायता और अमसय मृत्यु की स्थिति में कर्मचारी के अंतिम संस्कार के लिए पचास हजार रुपये तक की व्यवस्था तथा मातृत्व अवकाश सहित अन्य वैधानिक सेवा लाभ पारिवारिक सुरक्षा कवच हैं। यूपीकॉस पोर्टल और वेबसाइट की लॉन्चिंग इस पूरी व्यवस्था को डिजिटल पारदर्शिता से जोड़ती है जहां हर कार्मिक की समस्या सुनने और सुलझाने की संस्थागत व्यवस्था मौजूद है। 

मुख्यमंत्री स्वयं यह मानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और नई अर्थव्यवस्था के दौर में काम की प्रकृति भले बदल रही हो, लेकिन मानव श्रम की गरिमा कभी नहीं बदलेगी। यह मानव श्रम के प्रति सम्मान का परिचायक है। इसी सम्मान भाव का प्रतीक यूपीकॉस और योगी सरकार के वे सभी फैसले हैं जिसमें किसान, नौजवान, महिलाओं, कारीगर, रेहड़ी-पटरी वाले, छोटे उद्यमी और सरकारी कर्मचारी, सभी को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया गया। वृद्धावस्था, निराश्रित महिला और दिव्यांगजन पेंशन जो 2017 में मात्र तीन सौ रुपये थी, आज बढ़कर पंद्रह सौ रुपये हो चुकी है। रसोइयों के मानदेय में भी बढ़ोतरी की गई है। ये सभी कदम एक ऐसी नीति को दर्शाते हैं, जिसमें समाज के हर वंचित और उपेक्षित वर्ग को सम्मान और सुरक्षा देने का प्रयास किया जा रहा है।

लाभार्थियों की प्रतिक्रियाएं इस निर्णय की सार्थकता को और पुख्ता करती हैं। संविदाकर्मियों का कहना है कि इस निर्णय से अब घर चलाना आसान होगा और उनके जीवन में बड़ा बदलाव आएगा। पोर्टल और वेबसाइट की पारदर्शिता उन्हें यह भरोसा देती है कि अब उनकी बात सुनी जाएगी। यह भरोसा ही किसी भी कल्याणकारी नीति की सबसे बड़ी सफलता होता है। वस्तुतः यूपीकॉस सिर्फ एक प्रशासनिक निगम नहीं,  बल्कि एक सामाजिक वादा है। यह उस विश्वास की पुनर्स्थापना है कि सरकार और कर्मचारी का रिश्ता केवल वेतन और काम का नहीं, बल्कि भरोसे और जिम्मेदारी का होता है।

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सनी सिंह (लेखक, दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में शोधार्थी हैं और नई दिल्ली स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन (SPMRF) में रिसर्च एसोसिएट के रूप में कार्यरत हैं।

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