
जयपुर
पंचायत चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के 40 से ज्यादा बड़े नेता प्रचार की कमान संभालने के बजाय परिजन के वार्डों तक सिमट गए है। बड़े नेताओं ने पुत्र-पुत्रियों, पत्नी, पुत्रवधू और अन्य रिश्तेदारों को जिला परिषद व पंचायत समिति चुनाव में उतारा है। टिकट वितरण के दौरान परिजन के लिए दावेदारी करने वाले नेताओं की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। पार्टी के भीतर टिकट के दूसरे दावेदारों के बीच अपने परिवार के सदस्यों को उम्मीदवार बनाने के लिए अड़े नेताओं के सामने अब उन्हें जिताने की चुनौती है।
आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी के लिहाज से भी इन नतीजों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस के अलावा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रमुख और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल के परिजन भी चुनाव मैदान में है। वहीं, कुछ जिलाध्यक्षों ने खुद जिला परिषद या पंचायत समिति चुनाव में उतरकर अपनी जीत को प्राथमिकता दी है।
इन नेताओं के परिजन मैदान में
भाजपाः नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा, राज्य मंत्री मंजू बाघमार, विधायक विक्रम बंशीवाल, पूर्व सांसद कनकमल कटारा, नरेंद्र कुमार और संतोष अहलावत, विधायक शंकरलाल देचा, पूर्व मंत्री कालूलाल गुर्जर, पूर्व विधायक गोपीचंद मीणा और सैनिक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष प्रेमसिंह बाजौर के परिजन चुनाव मैदान में हैं।
कांग्रेसः पूर्व मंत्री ममता भूपेश, अमीन खान, हादी खान, पूर्व मंत्री गोविंद राम मेघवाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री महादेव सिंह खंडेला, पूर्व सांसद ताराचंद भगौरा, विधायक अर्जुन बामनिया, डी.सी. बैरवा, रमिला खड़िया, पुष्करलाल डांगी, पूर्व विधायक मंजू मेघवाल और महेंद्र गुर्जर के परिजन चुनाव लड़ रहे हैं।
कुछ क्षेत्रों में त्रिकोणीय मुकाबला
भाजपा और कांग्रेस के सामने टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर चुनाव मैदान में उतरे बागी प्रत्याशियों की चुनौती भी है। वहीं, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) और भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) की सक्रियता से कुछ क्षेत्रों में मकाबला त्रिकोणीय हो गया है।
परिजन के वार्ड में प्रतिष्ठा की परीक्षा
पंचायत चुनाव में परिजन को उतारने वाले 40 से अधिक नेताओं के लिए संबंधित वार्ड प्रतिष्ठा का सवाल बन गए हैं। रणनीति सिर्फ वार्ड जीतने की नहीं, बल्कि जिला प्रमुख और प्रधान की कुर्सी तक पहुंचने की राह बनाने की भी है। हार से टिकट और रणनीति पर सवाल उठेंगे।




