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CG : ‘राखी का रिश्ता, भरोसे का साथ – विष्णु भैया संग विकास की बात’

By kadwaghut|23 Aug 2026, 4:41 PM
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कम लागत में राखियां बनाकर आत्मनिर्भरता की राह पर बढ़ रहीं बिहान की महिलाएं

घरेलू और स्थानीय संसाधनों का रचनात्मक उपयोग, सीजनल गतिविधियों से बढ़ा आजीविका का आधार

रायपुर,

छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन

छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़कर ग्रामीण महिलाएं समूह के माध्यम से विभिन्न आजीविका गतिविधियों को अपनाते हुए आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बन रही हैं। सरगुजा जिले के अम्बिकापुर विकासखंड के ग्राम पंचायत किशुन नगर की जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह की महिलाएं भी इसी बदलाव की प्रेरक मिसाल बनकर उभरी हैं। समूह की महिलाएं मौसम और त्योहारों के अनुरूप सीजनल गतिविधियों का चयन कर अपनी आय के नए अवसर तैयार कर रही हैं।
रक्षाबंधन पर्व को देखते हुए इन दिनों समूह की महिलाएं घर में उपलब्ध सामग्री और स्थानीय संसाधनों से आकर्षक राखियां तैयार कर रही हैं। चावल, गेहूं, मक्का और कोहड़े के बीज सहित अन्य सामग्री को रंगकर और सजाकर सुंदर राखियां बनाई जा रही हैं। वहीं रेशमी धागे, ऊन और अन्य सजावटी सामग्री आवश्यकतानुसार बाजार से खरीदी जाती है। इससे राखियों की उत्पादन लागत कम रहती है और महिलाओं को बेहतर आय अर्जित करने का अवसर मिलता है।

12 महिलाओं ने मिलकर संवारी आजीविका
समूह की सदस्य सोनाली सिंह ने बताया कि जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह में कुल 12 महिलाएं हैं। सभी सदस्य मिलकर अलग-अलग मौसम और त्योहारों के अनुरूप आजीविका गतिविधियों का संचालन करती हैं। वर्तमान में राखी निर्माण का कार्य किया जा रहा है। तैयार राखियों को विभिन्न स्थानों पर स्टॉल लगाकर तथा घर से भी बेचा जा रहा है।
उन्होंने बताया कि बिहान योजना से जुड़ने से पहले महिलाओं के पास आय के सीमित साधन थे। स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें प्रशिक्षण, योजनाओं और विभिन्न आजीविका गतिविधियों से जुड़ने का अवसर मिला। इससे महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ा और वे आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करने लगीं।

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घरेलू सामग्री से तैयार हो रहीं आकर्षक राखियां
समूह की सदस्य दीप्ति चौधरी बताती हैं कि राखी निर्माण में घरेलू सामग्री का उपयोग किया जा रहा है। पुराने बीज, चावल, गेहूं और मक्के के दानों को आकर्षक रंग देकर उनसे अलग-अलग डिजाइन तैयार किए जाते हैं। इसके साथ रेशमी धागे, ऊन और अन्य सजावटी सामग्री का उपयोग कर राखियों को आकर्षक रूप दिया जाता है।
समूह की महिलाएं अपने खाली समय में एक साथ बैठकर राखियां तैयार करती हैं। त्योहार के दौरान मांग बढ़ने पर उत्पादन भी बढ़ा दिया जाता है। तैयार राखियों की बिक्री बाजार में लगाए गए छोटे-छोटे स्टॉल और घर से की जा रही है। इस तरह महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ अपने हुनर को आय के साधन में बदल रही हैं।

तीन वर्षों से सीजनल गतिविधियों से जुड़ी महिलाएं
समूह की सदस्य आशा रवि ने बताया कि समूह की महिलाएं पिछले लगभग तीन वर्षों से कम लागत में घरेलू सामग्री से राखियां तैयार कर रही हैं। समूह की सभी महिलाएं मिलकर इस कार्य में भागीदारी करती हैं। उन्होंने कहा कि बिहान योजना से जुड़ने के बाद उन्हें रोजगार और आजीविका की विभिन्न गतिविधियों से जुड़ने का अवसर मिला है।
उन्होंने बताया कि समूह से जुड़ने से महिलाओं को नई गतिविधियां सीखने, घर से बाहर निकलकर आर्थिक कार्यों में भागीदारी करने और अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर मिला है। इससे महिलाओं के आत्मविश्वास के साथ-साथ परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में भी मदद मिल रही है।

सीजन के अनुसार बदलती गतिविधियां, बढ़ते आय के अवसर
जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह की महिलाएं वर्षभर मौसम और त्योहारों के अनुरूप अलग-अलग गतिविधियों का चयन करती हैं। इससे उन्हें एक ही व्यवसाय पर निर्भर रहने के बजाय आय के अनेक अवसर मिलते हैं। समूह के माध्यम से सामूहिक रूप से कार्य करने से उत्पादन, प्रशिक्षण, बाजार और बिक्री में भी एक-दूसरे का सहयोग मिलता है।
राखी निर्माण जैसी गतिविधियों ने महिलाओं को यह अवसर दिया है कि वे घर और आसपास उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर कम लागत में उत्पाद तैयार करें और उन्हें बाजार तक पहुंचाकर आय अर्जित करें। यह पहल स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ महिला उद्यमिता को भी बढ़ावा दे रही है।

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“बहनों की तरक्की, परिवार की शान-विष्णु भैया का यही अभियान”
जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने बिहान योजना के माध्यम से आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त किया। महिलाओं ने कहा कि समूह से जुड़ने के बाद उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त होने, अपने हुनर को पहचान देने और आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है।
किशुन नगर की इन महिलाओं की कहानी बताती है कि स्थानीय संसाधनों, सामूहिक प्रयास और सरकारी योजनाओं का सहयोग मिल जाए तो छोटे स्तर की गतिविधियां भी महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती हैं। रक्षाबंधन के लिए तैयार की जा रही ये राखियां केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मविश्वास, स्वावलंबन और बदलती आर्थिक भूमिका की भी पहचान बन रही हैं।

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