मध्य प्रदेशराज्‍य

Gwalior High Court का बड़ा फैसला: सौतेले बेटे को भी माना बेटा, कारोबार के लिए दुकान खाली कराने का हक

By Admin|12 Aug 2026, 12:12 PM
f X W

ग्वालियर
 सौतेला बेटा भी किरायेदारी कानून के तहत बेटे की श्रेणी में आता है। यदि उसके कारोबार के लिए दुकान की वास्तविक जरूरत है, तो मां अपनी संपत्ति पर काबिज किराएदार से दुकान खाली करा सकती है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने करीब 21 साल पुराने किरायेदारी विवाद में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस आशीष श्रोती ने सेकंड अपील स्वीकार करते हुए निचली अपीलीय अदालत के उस निर्णय को निरस्त कर दिया, जिसमें सौतेले बेटे की कारोबारी जरूरत को आधार बनाकर दुकान खाली कराने से इनकार किया गया था।

1972 से किराए पर थी दुकान
मामला गुना की मटकरी कॉलोनी स्थित 'आनंद भवन' की दुकान से जुड़ा है। यह दुकान वर्ष 1972 में आनंद राव मटकरी ने किराए पर दी थी। उनके निधन के बाद पारिवारिक बंटवारे में दुकान उनकी बेटी विजया के हिस्से में आई।

विजया ने अपने बेटे आशुतोष के कारोबार के लिए दुकान की जरूरत बताते हुए किराएदार से दुकान खाली कराने का मुकदमा दायर किया था। आशुतोष, विजया के पति आनंद कुमार की पहली पत्नी आरती का बेटा है। आरती का वर्ष 1992 में निधन हो गया था। इसके अगले वर्ष 1993 में आनंद कुमार ने विजया से विवाह किया। विजया और आनंद कुमार की अपनी कोई संतान नहीं है।

ट्रायल कोर्ट ने माना था विजया का दावा
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने विजया के पक्ष में फैसला देते हुए किराएदार को दुकान खाली करने की डिक्री जारी की थी। हालांकि, निचली अपीलीय अदालत ने इस निर्णय को पलट दिया। उसका मानना था कि सौतेले बेटे की कारोबारी जरूरत को आधार बनाकर किराएदार से दुकान खाली नहीं कराई जा सकती।

READ ALSO  अवैध निर्माण की शिकायत करने वाली संस्था ने मांगा पक्षकार बनने का अधिकार, हाईकोर्ट में आवेदन

इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा
    'फॉस्टर सन' को मान्यता तो सौतेला बेटा क्यों नहीं: हाईकोर्ट ने निचली अपीलीय अदालत के निष्कर्ष को सही नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि यदि किरायेदारी कानून के तहत 'फॉस्टर सन' यानी पालन-पोषण किए गए बेटे को भी बेटे के रूप में माना जा सकता है, तो सौतेले बेटे को इससे अलग रखने का कोई उचित आधार नहीं है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस वजह से आशुतोष को मां की कोख से जन्मा बेटा नहीं माना जा सकता, उसकी कारोबारी जरूरत को खारिज नहीं किया जा सकता। उसकी जरूरत को कानून के तहत बेटे की जरूरत के रूप में देखा जा सकता है।
    पहली मंजिल की जगह दुकान का विकल्प नहीं: किराएदार की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि भवन की पहली मंजिल पर दूसरी जगह उपलब्ध है, इसलिए ग्राउंड फ्लोर की दुकान खाली कराने की जरूरत नहीं है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया।

    कोर्ट ने कहा कि कारोबारी गतिविधियों के लिए पहली मंजिल की जगह को ग्राउंड फ्लोर की दुकान का समान विकल्प नहीं माना जा सकता। दुकान की प्रकृति, स्थान और कारोबार की जरूरत को देखते हुए मालिक की वास्तविक आवश्यकता का आकलन किया जाना चाहिए।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सेकंड अपील स्वीकार करते हुए निचली अपीलीय अदालत का फैसला पलट दिया और विजया के पक्ष में पहले से हुई बेदखली की डिक्री को बहाल कर दिया।

 

अगली खबर लोड हो रही है...

Related Articles

Back to top button
Play GK Quiz and Win Coins