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प्रयागराज कार्यक्रम में सनातन, गुरु-शिष्य परंपरा और सामाजिक एकता पर बोले नीतीश भारद्वाज

By Admin|24 Apr 2026, 3:11 PM
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प्रयागराज

संगम नगरी प्रयागराज में बागेश्वर धाम सरकार धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की ओर से आयोजित तीन दिवसीय हनुमान कथा में आध्यात्म, संस्कृति और समकालीन मुद्दों का संगम देखने को मिला। इस अवसर पर टीवी धारावाहिक महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका निभाने वाले अभिनेता नीतीश भारद्वाज भी शामिल हुए। उन्होंने अपने संबोधन में गुरु-शिष्य परंपरा, सनातन धर्म, समाज की एकता और वर्तमान समय की चुनौतियों पर विस्तार से बात की।

साथ ही उनके बयान ने कार्यक्रम में खास चर्चा बटोरी, जिसमें उन्होंने कहा, 'प्रेम उसी को देंगे जो हमसे प्रेम करेगा, और जो तलवार लेकर सामने खड़ा होगा, उसके सामने अहिंसा परमो धर्म: नहीं कहेंगे। बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, आज भी महाभारत चल रही है और हिंदू धर्म को अलग-थलग करने के लिए कई शक्तियां पीछे लगी हैं।

गुरु-शिष्य परंपरा से की शुरुआत
नीतीश भारद्वाज ने अपने उद्बोधन की शुरुआत 'सदाशिवसमारम्भां शंकराचार्यमध्यमाम्…' श्लोक के साथ की और कहा कि भारत की संस्कृति गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है। उन्होंने प्रयागराज की पावन धरती को ऋषि परंपरा से जोड़ते हुए कहा कि यह स्थान सदियों से ज्ञान और आध्यात्म का केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि महाकुंभ के दौरान पहली बार प्रयाग आने का अवसर मिला था और अब धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आमंत्रण पर दोबारा यहां आने का सौभाग्य मिला है।

'आज भी चल रही है महाभारत'
उन्होंने वर्तमान समय को महाभारत काल से जोड़ते हुए कहा कि आज भी समाज एक प्रकार के संघर्ष से गुजर रहा है। उनके अनुसार, जैसे द्वापर युग में धर्म की रक्षा की आवश्यकता थी, उसी प्रकार आज कलयुग में भी धर्म और मूल्यों की रक्षा जरूरी हो गई है।

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आज के समय को देखते हुए कह सकता हूं कि आज भी महाभारत चल रही है, एक अलग तरह की महाभारत। धर्म की रक्षा की आवश्यकता फिर से आन पड़ी है। आज हिंदू धर्म को अलग-थलग करने के लिए कई शक्तियां पीछे लगी हैं।

गीता के श्लोक से दिया प्रेरणा संदेश
नीतीश भारद्वाज ने गीता का श्लोक 'कुतस्त्वा कश्मलमिदं…' उद्धृत करते हुए कहा कि कठिन और विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज में कई तरह की शक्तियां सक्रिय हैं, लेकिन ऐसे समय में धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखना जरूरी है।

'सनातन ही मूल आधार'
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म ही इस देश की मूल पहचान है और इसकी सहिष्णुता के कारण ही अन्य धर्म यहां फल-फूल सके। उन्होंने यह भी कहा कि आज इसी सहिष्णुता का कुछ लोग गलत फायदा उठा रहे हैं और सनातन पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

समाज में एकता की जरूरत
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि समाज को लंबे समय तक जातियों और वर्गों में बांटा गया, लेकिन अब समय है कि सभी लोग एकजुट हों। उन्होंने गीता के 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्…' श्लोक का उल्लेख करते हुए बताया कि समाज का संतुलन सभी वर्गों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के समन्वय से ही संभव है और किसी एक हिस्से के कमजोर होने से पूरा ढांचा प्रभावित होता है।

'प्रेम का उत्तर प्रेम, लेकिन आक्रमण का जवाब भी'
अपने संबोधन के अंत में नीतीश भारद्वाज ने स्पष्ट कहा कि प्रेम का उत्तर प्रेम से दिया जाएगा, लेकिन अगर कोई आक्रमण करेगा तो उसका जवाब भी दिया जाएगा। उन्होंने कहा, 'हम अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले हैं, लेकिन यदि कोई तलवार लेकर सामने खड़ा होगा तो हमें छत्रपति शिवाजी महाराज और छत्रपति संभाजी महाराज बनना भी आता है।'

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उन्होंने इसे धर्म की रक्षा का कर्तव्य बताते हुए कहा कि समय के अनुसार आचरण करना ही सच्चा धर्म है।

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