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CG : मानव का शरीर मिलना पर्याप्त नहीं, जीवन में मानवता का होना जरूरी : मुनि संवेगरत्न सागर…

By kadwaghut|17 Aug 2026, 11:32 AM
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रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में प्रतिदिन ज्ञान की गंगा बह रही है। रविवार को विशेष प्रवचनमाला में मुनि संवेगरत्न सागर ने मानव जीवन की सार्थकता पर प्रकाश डाला। मुनि ने कहा कि केवल मानव शरीर मिल जाना पर्याप्त नहीं है, जीवन में मानवता के गुणों का होना भी जरूरी है। व्यक्ति मानव बन गया, लेकिन उसके भीतर दानव बैठा है तो ऐसा मानव जीवन व्यर्थ है।

मुनि ने कहा कि मानव जीवन की भूमिका प्राप्त करने के बाद वास्तविक अर्थों में मानव बनना आवश्यक है। अहंकार की परंपरा बढ़ती जाएगी तो दुर्गति की परंपरा भी बढ़ती जाएगी। जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए इसमें प्रमाद नहीं करना चाहिए और प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए। जीवन का दुरुपयोग करने पर आत्मकल्याण और भव सुधार की दिशा में आगे बढ़ना कठिन हो जाता है।

बाहर की तस्वीर अच्छी, भीतर की एक्स-रे रिपोर्ट कैसी ?
मुनि ने आत्मचिंतन देते हुए कहा कि व्यक्ति को विचार करना चाहिए कि यदि बाहर से खिंची उसकी तस्वीर बहुत अच्छी आए, लेकिन भीतर की एक्स-रे रिपोर्ट खराब हो तो उसे कैसा लगेगा। इसी तरह बाहरी व्यक्तित्व को संवारने के साथ आत्मा को भी निर्मल बनाना जरूरी है।

मुनि ने उत्तम मानव बनने के लिए जीवन में सत्संग को अनिवार्य बताया। साथ ही बड़ों का सदैव आदर-सम्मान करने, उनका आशीर्वाद लेने और लोकविरुद्ध आचरण व व्यापार का त्याग करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि दुराचरण व्यक्ति की आत्मा को मलिन करता है।

पाप से डरने वाला ही लक्ष्य तक पहुंचता है
मुनि ने कहा कि शास्त्रकार भगवंतों ने लोकविरुद्ध आचरण से बचने का संदेश दिया है। दुर्लभ मानव जीवन को दुर्गति की ओर ले जाने वाली गतिविधियों से बचना चाहिए। वीतराग के पथ पर चलने वाला पापभीरू जीव, अर्थात पाप से डरने वाला व्यक्ति ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। जो पाप से नहीं डरता, वह जीवन चक्र में उलझा रहता है। उन्होंने कहा कि भौतिक साधनों और सुख-सुविधाओं की लालसा जितनी बढ़ती जाती है, व्यक्ति उतना ही अधिक दुखी हो सकता है।

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