मध्य प्रदेशराज्‍य

मध्यप्रदेश में प्रशासनिक मामलों के लिए फिर बनेगा अलग ट्रिब्यूनल, सरकार ने शुरू की कवायद

By Admin|03 Jun 2026, 7:06 PM
f X W

भोपाल 
म.प्र. के अधिकारी-कर्मचारियों की तरफ से हाईकोर्ट में दायर साढ़े चार लाख केस के निपटारे को लेकर राज्य सरकार 23 साल बाद फिर राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल गठित करने की तैयारी में है। इसको लेकर सहमति बन चुकी है। वर्तमान में जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर में कर्मचारियों के भर्ती, वेतन, पदोन्नति, पेंशन और सेवा शर्तों से जुड़े करीब साढ़े चार लाख मामले लंबित हैं। ट्रिब्यूनल के गठन से इन मामलों का अलग से और तेजी से निपटारा हो सकेगा। दिग्विजय सिंह सरकार के कार्यकाल के दौरान इसे बंद कर दिया गया था जिसे अब एक नए स्वरूप में फिर से चालू किया जा रहा है।

Advertisement
Advertisement

मध्य प्रदेश के अधिकारी-कर्मचारियों की तरफ से हाईकोर्ट में दायर साढ़े चार लाख केस के निपटारे को लेकर राज्य सरकार 23 साल बाद फिर राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल) गठित करने की तैयारी में है।

इसको लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अनुराग जैन के बीच बनी सहमति बन चुकी है। अब सामान्य प्रशासन विभाग इसके गठन का खाका तैयार करने में जुटा है। उधर, एमपी हाईकोर्ट में पेंडिंग केस बढ़ने के कारण न्यायाधीशों के नए पद सृजित किए जाने के प्रस्ताव भी सरकार तक पहुंचे हैं।

राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के गठन की कवायद को लेकर सरकार का मानना है कि इससे एमपी के कर्मचारियों की भर्ती, वेतन, पदोन्नति, पेंशन और सेवा शर्तों से संबंधित विवादों और शिकायतों के मामले कोर्ट के बजाय ट्रिब्यूनल के जरिए निराकृत हो सकेंगे।

सरकार का यह भी मानना है कि स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (एसएटी) के गठन के बाद एमपी के मुख्य हाईकोर्ट जबलपुर, खंडपीठ इंदौर और ग्वालियर में कर्मचारियों से संबंधित मामलों की सुनवाई ट्रिब्यूनल में हो सकेगी। ऐसे में इन न्यायालयों पर पड़ने वाले न्यायालयीन मामलों का बोझ कम हो सकेगा।

READ ALSO  शंघाई में आयोजित वर्ल्ड स्किल्स कॉन्फ्रेंस में आईसेक्ट प्रतिनिधियों की सहभागिता

कर्मचारियों की सेवा शर्तों से संबंधित मामलों की सुनवाई ट्रिब्यूनल के फैसले की अपील के लिए ही किए जा सकेंगे। सरकार ने ड्राफ्ट को मंजूरी मिलते ही तीनों ही न्यायालय में कर्मचारियों से संबंधित साढ़े 4 लाख मामलों की संख्या में कमी लाने के उद्देश्य से इस फैसले को जल्दी ही लागू करने के संकेत भी दिए हैं।

दूसरे राज्यों के ट्रिब्यूनल की वर्किंग की स्टडी
मोहन यादव सरकार मध्य प्रदेश के एसएटी के गठन के पहले दूसरे राज्यों में संचालित राज्य प्रशासनिक अधिकरण की वर्किंग और वक्त के हिसाब में किए गए बदलाव की स्टडी भी करने का निर्णय लिया है।

इसके लिए सामान्य प्रशासन विभाग दूसरे राज्यों के ट्रिब्यूनल की जानकारी लेकर एमपी की मौजूदा परिस्थितियों के आधार पर प्रस्ताव तैयार करेंगे जिसे मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की स्वीकृति मिलने के बाद कैबिनेट में अनुमोदन के लिए रखा जाएगा। फिर इसे विधानसभा में विधेयक लाकर मंजूरी दी जाएगी।

दिग्विजय सरकार में बंद किया गया था प्रशासनिक ट्रिब्यूनल
मध्यप्रदेश राज्य प्रशासनिक अधिकरण (MPAT) को राज्य सरकार ने 2001 में ही बंद कर दिया था। इसके पीछे तब की दिग्विजय सिंह सरकार द्वारा एमपी का पुनर्गठन और प्रशासनिक कारण बताए गए थे।

इसके बाद राज्य सरकार के आग्रह पर भारत सरकार द्वारा एक अधिसूचना के माध्यम से 17 अप्रैल 2003 को आधिकारिक रूप से ट्रिब्यूनल को समाप्त कर दिया गया था।

13 साल ही काम कर पाया था ट्रिब्यूनल
इस अधिकरण को राज्य सरकार के अनुरोध पर केंद्र सरकार द्वारा प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 4(2) के अंतर्गत 29 जून 1988 को स्थापित किया गया था। इसके बाद प्रदेश के कर्मचारियों से जुड़े सेवा मामलों का निपटारा मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य बेंच (जबलपुर) और खंडपीठों (इंदौर और ग्वालियर) द्वारा किया जाता है।

READ ALSO  काशी के हुनर की दुनिया में बढ़ेगी पहचान, UP International Trade Show के जरिए वैश्विक बाजार से जुड़ेंगे कारीगर

मध्य प्रदेश राज्य प्रशासनिक अधिकरण राज्य के कर्मचारियों को सेवा संबंधी मामलों में त्वरित और सस्ता न्याय दिलाने के लिए यह एक प्रमुख संस्था थी जिसमें वर्ष 2001 से काम बंद हुआ और 2003 में केंद्र ने इसको मंजूरी दे दी थी।

भर्ती, वेतन, पदोन्नति, पेंशन और सेवा शर्तों से जुड़े विवाद, शिकायतों पर सुनवाई का अधिकार
जब यह ट्रिब्यूनल काम कर रहा था तो इसमें उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या सेवानिवृत्त न्यायाधीश तथा न्यायिक व प्रशासनिक सदस्य नियुक्त किए जाते थे। यह नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती थी।

ट्रिब्यूनल को राज्य सरकार के कर्मचारियों की भर्ती, वेतन, पदोन्नति, पेंशन और सेवा शर्तों से जुड़े विवादों और शिकायतों पर सुनवाई का अधिकार था।

इसमें यह व्यवस्था भी थी कि ट्रिब्यूनल के निर्णयों के खिलाफ अपील सीधे उच्च न्यायालय में की जा सकती थी। प्रशासनिक न्याय अधिकरण को जब बंद किया गया था, तब प्रदेश में कर्मचारियों से संबंधित लंबित मामलों की संख्या 30 हजार थी, जिसे राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया था।

 

अगली खबर लोड हो रही है...

Related Articles

Back to top button
Play GK Quiz and Win Coins