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जबलपुर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, ‘9 साल में 10वीं पास संभव नहीं’; POCSO केस में 20 साल की सजा रद्द

By Admin|03 Jul 2026, 9:23 AM
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जबलपुर
 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पॉक्सो कानून और पीड़िता की उम्र निर्धारण को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि अभियोजन पक्ष पीड़िता की जन्मतिथि को संतोषजनक और पुख्ता ढंग से साबित नहीं कर पाता है, तो केवल 'पॉजिटिव डीएनए रिपोर्ट' के आधार पर आरोपी को दोषी मानकर सजा नहीं दी जा सकती।

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कोर्ट का सवाल, 9 साल में कैसे पास कर ली 10वीं कक्षा?
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्कूल रिकॉर्ड और मार्कशीट में दर्ज पीड़िता की उम्र पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने तार्किक विसंगति को रेखांकित करते हुए कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता ने जुलाई 2014 में एलकेजी में दाखिला लिया था। ऐसे में कोई भी बच्ची महज 9 साल के भीतर (2023 के आसपास) कक्षा 10वीं कैसे उत्तीर्ण कर सकती है? युगलपीठ ने इस विसंगति के चलते 10वीं की मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि जो 27 फरवरी 2007 थी को सही मानने से इनकार कर दिया।

क्या है पूरा मामला?
दरअसल, सिंगरौली के रहने वाले मुन्ना राम को जिला अदालत ने पीड़िता को नाबालिग मानते हुए पॉक्सो एक्ट सहित अन्य गंभीर धाराओं के तहत अधिकतम 20 साल की जेल की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

    जन्मतिथि साबित न हो तो केवल डीएनए रिपोर्ट से दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
    जबलपुर हाईकोर्ट ने POCSO मामले में 20 साल की सजा रद्द की।
    दसवीं की मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि पर कोर्ट ने जताया संदेह।
    मेडिकल रिपोर्ट में जबरन संबंध के स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिले।
    अभियोजन उम्र साबित नहीं कर पाया, आरोपी को दोषमुक्त किया।

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पीड़िता के परिजन के बयानों में विरोधाभास
अपील पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के माता-पिता के बयानों में उनकी शादी के साल और पीड़िता के जन्म को लेकर गहरा विरोधाभास था। पिता के अनुसार उनकी शादी 19 साल पहले हुई थी और उसके 1 साल बाद पीड़िता का जन्म हुआ, जबकि मां के अनुसार शादी 20 साल पहले हुई थी और जन्म 2 साल बाद हुआ था।

आपसी सहमति से संबंध और मेडिकल रिपोर्ट बनी आधार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में नोट किया कि पीड़िता ने खुद अपने बयानों में स्वीकार किया था कि वह अपनी मर्जी से अपीलकर्ता के साथ बनारस गई थी, जहां दोनों ने शादी की और पति-पत्नी की तरह रहने लगे। इसके अलावा, मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी या अंदरूनी चोट के निशान नहीं मिले। प्राइवेसी के उल्लंघन को लेकर भी डॉक्टरों की कोई निश्चित राय नहीं थी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
युगलपीठ ने कहा कि, चूंकि अभियोजन पक्ष पीड़िता की जन्मतिथि को संदेह से परे साबित नहीं कर सका, इसलिए पीड़िता को घटना के समय बालिग माना जाएगा। चूंकि संबंध आपसी सहमति से बने थे, इसलिए केवल डीएनए रिपोर्ट पॉजिटिव आने से आरोपी अपराधी सिद्ध नहीं होता। हाईकोर्ट ने जिला न्यायालय के आदेश को पूरी तरह निरस्त करते हुए अपीलकर्ता मुन्ना राम को तत्काल दोषमुक्त करने के आदेश जारी किए हैं।

 

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