छत्तीसगढ़राजनांदगांव जिला

भाजपा के लिए घुमका बना सबक: बड़े नेताओं की सभाएं, संगठन की ताकत… फिर भी हार

By kadwaghut|07 Jun 2026, 11:25 AM
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घुमका नपा चुनाव में भाजपा की हार पर तकरार: बड़े नेताओं के दौरे के बाद भी नहीं बचा किला, भीतरघात की चर्चा तेज


घुमका/राजनांदगांव।
घुमका नगर पंचायत अध्यक्ष चुनाव में भाजपा की हार के बाद अब पार्टी के अंदर तकरार और आत्ममंथन का दौर शुरू हो गया है। चुनाव में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी थी। प्रदेश स्तर से लेकर जिला संगठन तक के नेता मैदान में सक्रिय दिखाई दिए, लेकिन इसके बावजूद अध्यक्ष पद कांग्रेस के खाते में चला गया। अब हार के बाद भाजपा के भीतर भीतरघात, गुटबाजी और स्थानीय स्तर पर समन्वय की कमी को लेकर गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।


घुमका का यह चुनाव भाजपा के लिए सामान्य चुनाव नहीं माना जा रहा था। यहां उपमुख्यमंत्री अरुण साव, सांसद संतोष पांडे, पूर्व सांसद अभिषेक सिंह, महापौर मधुसूदन यादव सहित कई बड़े नेताओं का आगमन हुआ था। चुनावी प्रचार में भाजपा संगठन ने भी पूरी ताकत लगाई थी। महापौर मधुसूदन यादव को क्षेत्र में प्रमुख जिम्मेदारी के साथ चुनावी प्रबंधन में लगाया गया था। माना जा रहा था कि बड़े नेताओं की सक्रियता और संगठन की मजबूती से भाजपा आसानी से मुकाबला अपने पक्ष में कर लेगी, लेकिन परिणाम ने पार्टी को बड़ा झटका दे दिया।


कोमल सिंह राजपूत के जिला अध्यक्ष बनने के बाद पहला चुनाव, इसलिए बढ़ी चर्चा
भाजपा जिला अध्यक्ष कोमल सिंह राजपूत के लिए भी यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था। जिला अध्यक्ष बनने के बाद यह उनका पहला बड़ा चुनावी इम्तिहान था। जिला भाजपा के पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी घुमका में लगातार सक्रिय रहे। बूथ स्तर तक बैठकों और संपर्क अभियान की बात कही गई, लेकिन परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं आया।
हार के बाद अब राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि जब प्रदेश और जिला स्तर के बड़े नेता मैदान में थे, संगठन भी सक्रिय था, फिर भाजपा प्रत्याशी को अपेक्षित समर्थन क्यों नहीं मिला। क्या स्थानीय नाराजगी को समय रहते नहीं समझा गया, क्या कार्यकर्ताओं में तालमेल की कमी रही, या फिर भीतरघात ने भाजपा का समीकरण बिगाड़ दिया—इन सवालों ने भाजपा के अंदर हलचल बढ़ा दी है।
बड़े नेताओं की मेहनत के बाद भी परिणाम उल्टा
चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। बड़े नेताओं के दौरे, सभाएं, जनसंपर्क और संगठनात्मक बैठकों के जरिए माहौल बनाने की कोशिश की गई। सांसद संतोष पांडे, पूर्व सांसद अभिषेक सिंह और महापौर मधुसूदन यादव जैसे नेताओं की सक्रियता के बाद भाजपा खेमे को जीत की उम्मीद थी। लेकिन मतदान के बाद जो परिणाम आया, उसने भाजपा की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए।

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स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि वार्डों में भाजपा के कुछ पार्षद और समर्थक तो मजबूत स्थिति में रहे, लेकिन अध्यक्ष पद के लिए पार्टी को वैसा वोट ट्रांसफर नहीं हो पाया, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। यही कारण है कि हार के बाद भीतरघात की बात जोर पकड़ रही है।
कांग्रेस जीत से उत्साहित, भाजपा में निराशा
घुमका में कांग्रेस की जीत से पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह है। कांग्रेस इसे भाजपा की रणनीतिक हार और जनता के समर्थन की जीत बता रही है। वहीं भाजपा कार्यकर्ताओं में मायूसी के साथ नाराजगी भी दिखाई दे रही है। कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि चुनाव प्रबंधन में स्थानीय कार्यकर्ताओं को और बेहतर तरीके से जोड़ा जाता, तो परिणाम अलग हो सकता था।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि घुमका जैसे छोटे नगर पंचायत चुनाव में बड़े नेताओं की मौजूदगी के बाद भी हार होना भाजपा के लिए गंभीर संकेत है। यह हार केवल एक सीट की हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी और स्थानीय स्तर पर असंतोष का संकेत भी हो सकती है।


अब भाजपा के सामने आत्ममंथन की चुनौती
घुमका चुनाव के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती हार के कारणों की ईमानदार समीक्षा करने की है। पार्टी को यह देखना होगा कि कमी प्रचार में थी, प्रत्याशी चयन में थी, स्थानीय समीकरणों को समझने में थी या फिर संगठन के भीतर ही कुछ लोग पूरी मजबूती से काम नहीं कर पाए।
चुनाव में हार-जीत सामान्य बात है, लेकिन घुमका में जिस तरह बड़े नेताओं और जिला संगठन की मौजूदगी के बावजूद भाजपा को हार मिली है, उससे पार्टी के अंदर मंथन तेज होना तय है। अब देखना होगा कि भाजपा इस हार को केवल चुनावी हार मानकर आगे बढ़ती है या फिर भीतरघात और संगठनात्मक कमजोरी पर कड़ा कदम उठाती है।

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