बिहार / झारखण्डराज्‍य

लातेहार के हेरहंज में वन संपदा पर अवैध कब्जा, रातों-रात ट्रैक्टरों से हो रही तस्करी का खुलासा

By Admin|09 Jun 2026, 8:51 PM
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लातेहार
 हेरहंज व बारियातू के जंगल इन दिनों एक अजीब कहानी कह रहे हैं। पेड़ों की डालियों से टूटकर गिरते केंदुपत्ते मानो अपनी ही बेबसी का बयान कर रहे हों। जिन जंगलों की हरियाली कभी वन विभाग के राजस्व का आधार हुआ करती थी, वहां आज माफियाओं का साया गहराता दिख रहा है।

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सुरक्षित वन क्षेत्रों में अवैध रूप से केंदुपत्ता तुड़वाने और उसकी खरीद-बिक्री का खेल इस कदर फैल चुका है कि जंगलों से अधिक चहल-पहल अब गांवों के खलिहानों में दिखाई दे रही है।

खुलेआम अवैध खरीद केंद्र संचालित
बिदीर, डोंरांग, इचाक, खीराखाड़, करंदाग समेत कई गांवों में खुलेआम अवैध खरीद केंद्र संचालित होने की चर्चा है। यहां सुबह से शाम तक मजदूर जंगलों से पत्ते ढोते हैं और बदले में उन्हें उनकी मेहनत की कीमत से कहीं कम राशि थमा दी जाती है। पसीना ग्रामीणों का बहता है, जबकि मुनाफे की हरियाली किसी और की झोली में चली जाती है।

सूत्रों के अनुसार इस कारोबार की डोर आसपास के कुछ केंदुपत्ता ठेकेदारों से जुड़ी हुई है। स्थानीय लोगों को आगे कर खरीदारी करवाई जा रही है। पत्तों को भरने के लिए बोरे उपलब्ध कराए जा रहे हैं और रात ढलते ही ट्रैक्टरों तथा अन्य वाहनों पर लादकर इन्हें दूसरे स्थानों तक पहुंचा दिया जाता है।

कई जंगलों की नहीं हुई नीलामी
दिन में जंगलों में तुड़ाई और रात में परिवहन का यह सिलसिला चर्चा का विषय बना हुआ है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस वर्ष हेरहंज व बारियातू क्षेत्र के कई जंगलों की नीलामी ही नहीं हुई।

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नीलामी नहीं होने से वन विभाग को लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा। इसके बावजूद जंगलों से केंदुपत्ता निकल रहा है, खलिहान भर रहे हैं और कारोबार भी चल रहा है।
 
लगातार बढ़ रहे अवैध हाथ
यही सवाल अब ग्रामीणों के बीच गूंज रहा है कि जब नीलामी नहीं हुई तो केंदू पत्ता आखिर किस रास्ते से बाजार तक पहुंच रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं, बल्कि उनकी आजीविका और क्षेत्र की पहचान हैं।

ऐसे में यदि वन संपदा पर अवैध हाथ लगातार बढ़ते रहे तो नुकसान केवल सरकारी राजस्व का नहीं होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की विरासत भी दांव पर लग जाएगी। फिलहाल जंगलों की खामोशी बहुत कुछ कह रही है व लोग यह देखने का इंतजार कर रहे हैं कि वन विभाग इस खेल पर कब और कैसी लगाम लगाता है।

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