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झारखंड के सारंडा–गोइलकेरा में नक्सलियों का आत्मसमर्पण

By Admin|21 May 2026, 8:05 PM
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पश्चिमी सिंहभूम जिले के गोइलकेरा और सारंडा क्षेत्र में कभी माओवादी संगठनों का गहरा प्रभाव था. इन्हीं जंगलों से कई ऐसे नाम उभरे, जिन्होंने बाद में संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां संभालीं. इनमें सागेन आंगारिया उर्फ दोकोल, गादी मुण्डा उर्फ गुलशन, नागेंद्र मुण्डा उर्फ प्रभात मुण्डा और सुलेमान हांसदा जैसे नाम शामिल हैं. कभी गरीबी और अभाव में जीवन बिताने वाले ये युवक बाद में माओवादी संगठनों के सक्रिय कमांडर बन गए.

मजदूरी से माओवादी कमांडर बनने तक का सफर
गोइलकेरा क्षेत्र का रहने वाला सागेन आंगारिया उर्फ दोकोल सामान्य आदिवासी परिवार से जुड़ा था. ग्रामीणों के अनुसार उसका बचपन गरीबी, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच बीता. शुरुआती दिनों में वह मजदूरी और जंगल आधारित काम करके परिवार चलाता था. धीरे-धीरे वह इलाके में सक्रिय माओवादी संगठन के संपर्क में आया. स्थानीय युवाओं को पुलिस कार्रवाई, विस्थापन और सरकारी उपेक्षा का हवाला देकर संगठन से जोड़ा जाता था. सागेन भी इसी प्रचार से प्रभावित हुआ और बाद में हथियारबंद दस्ते का हिस्सा बन गया. समय के साथ वह माओवादी संगठन का विशेष क्षेत्र समिति सदस्य बना. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उसके खिलाफ 123 मामले दर्ज हैं और उस पर पांच लाख रुपये का इनाम घोषित था. लगातार सुरक्षा अभियानों और संगठन की कमजोर स्थिति के बाद उसने आत्मसमर्पण का फैसला लिया.

गादी मुण्डा बना एरिया कमांडर
रांची जिले के बुंडू क्षेत्र का निवासी गादी मुण्डा उर्फ गुलशन भी गरीब ग्रामीण परिवार से जुड़ा था. युवावस्था में रोजगार और स्थायी आय की कमी के कारण वह उग्रवादी नेटवर्क के संपर्क में आया. शुरुआत में उसने संगठन के लिए संदेश पहुंचाने और ग्रामीण नेटवर्क तैयार करने का काम किया. बाद में वह हथियारबंद दस्ते में शामिल हो गया और धीरे-धीरे एरिया कमांडर के पद तक पहुंच गया. पुलिस रिकॉर्ड में उसके खिलाफ 48 मामले दर्ज हैं. उस पर भी पांच लाख रुपये का इनाम था. जंगलों में लगातार चल रहे अभियान, सुरक्षा कैंपों की स्थापना और संगठन के भीतर बढ़ते अविश्वास के कारण उसका प्रभाव कमजोर पड़ गया. अंततः उसने मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया.

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नागेंद्र मुण्डा रहा सक्रिय माओवादी चेहरा
खूंटी जिले के अड़की क्षेत्र का निवासी नागेंद्र मुण्डा उर्फ प्रभात मुण्डा उर्फ मुखिया लंबे समय तक सक्रिय माओवादी कमांडर रहा. ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े नागेंद्र पर शुरुआती दिनों में उग्रवादी विचारधारा का प्रभाव पड़ा. संगठन ने उसे हथियार प्रशिक्षण दिया और जंगल अभियानों में शामिल किया. धीरे-धीरे वह संगठन का भरोसेमंद सदस्य बन गया. पुलिस के अनुसार वह पुलिस कैंपों पर हमले, विस्फोट और हथियार लूट जैसी घटनाओं में शामिल रहा. उसके खिलाफ 38 मामले दर्ज थे और उस पर पांच लाख रुपये का इनाम घोषित था. लगातार घेराबंदी, जंगलों में नए सुरक्षा कैंप और सप्लाई नेटवर्क टूटने के कारण उसकी गतिविधियां कमजोर हो गईं. इसके बाद उसने आत्मसमर्पण कर सामान्य जीवन में लौटने का फैसला लिया.

सुलेमान हांसदा ने भी छोड़ा हथियार
सुलेमान हांसदा उर्फ सुनीया हांसदा पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंडा क्षेत्र के हतनाबुरू गांव का निवासी है. आर्थिक कठिनाइयों और सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े सुलेमान को स्थानीय माओवादी नेटवर्क ने अपने साथ जोड़ लिया था. शुरुआत में वह जंगल के रास्तों की जानकारी देने, राशन पहुंचाने और सूचनाएं उपलब्ध कराने का काम करता था. बाद में वह सक्रिय दस्ते का हिस्सा बन गया. उसके खिलाफ 13 मामले दर्ज हैं और उस पर पांच लाख रुपये का इनाम था. हाल के वर्षों में सारंडा क्षेत्र में लगातार पुलिस और सीआरपीएफ अभियान चलाए गए. सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी और संगठन की कमजोर होती स्थिति के बीच सुलेमान ने भी हथियार छोड़ने का फैसला लिया. पुलिस द्वारा उसके परिजनों को संरक्षण में लेकर रांची भेजे जाने के बाद उसके आत्मसमर्पण की प्रक्रिया तेज हुई.

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