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हार से टिकट कटने तक… दतिया की राजनीति में क्या खत्म होने की ओर है नरोत्तम मिश्रा का दबदबा?

By Admin|11 Jul 2026, 7:01 PM
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दतिया

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दतिया का उपचुनाव अब सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गया है. इसने ग्वालियर-चंबल की राजनीति में सबसे बड़ी बहस छेड़ दी है. बीजेपी ने अपने सबसे चर्चित नेताओं में शामिल पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को मैदान में उतार दिया है. जिससे दतिया में बवाल मच गया और गुस्साए समर्थकों ने हाईवे जाम कर दिया. वहीं समर्थकों को जब पुलिस टीम हटाने गई तो पथराव कर दिया. जिससे कई पुलिसकर्म भी घायल हो गए.  जिसके बाद बवालियों को हटाने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले भी छोडे़. साथ ही कई को हिरासत में भी लिया है. नरोत्तम के टिकट कटने से सवाल सिर्फ इतना नहीं कि टिकट किसे मिला, बल्कि यह भी है कि जिस नेता ने 15 साल तक दतिया का प्रतिनिधित्व किया, मंत्री रहे, प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली चेहरा रहे, उसी पर पार्टी ने आखिर भरोसा क्यों नहीं जताया?

दरअसल नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक रिश्ता सिर्फ दतिया से नहीं, बल्कि ग्वालियर-चंबल की राजनीति से भी गहराई से जुड़ा रहा है. उनका पैतृक घर डबरा में है. वर्ष 2008 के परिसीमन में डबरा विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के बाद उन्होंने दतिया विधानसभा का रुख किया. बीजेपी के टिकट पर 2008, 2013 और 2018 में लगातार चुनाव जीते और शिवराज सिंह चौहान सरकार में गृह मंत्री समेत कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। 

2023 में कांग्रेस के राजेंद्र भारती से हार गए थे नरोत्तम मिश्रा
हालांकि 2023 का विधानसभा चुनाव उनकी राजनीति का सबसे बड़ा झटका साबित हुआ. तत्कालीन गृह मंत्री रहते हुए वे कांग्रेस के राजेंद्र भारती से चुनाव हार गए. इसके बाद राजेंद्र भारती की विधानसभा सदस्यता समाप्त होने से दतिया सीट खाली हुई और उपचुनाव की नौबत आई. राजनीतिक गलियारों में लंबे समय तक यही चर्चा रही कि बीजेपी एक बार फिर नरोत्तम मिश्रा पर दांव लगाएगी. पार्टी के भीतर भी उनका नाम प्रमुख दावेदार माना जा रहा था. लेकिन उम्मीदवारों की सूची जारी हुई तो तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। 

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टिकट मिला आशुतोष तिवारी को और यहीं से शुरू हो गई नई राजनीतिक बहस
बीजेपी ने इस फैसले की कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई है. लेकिन राजनीतिक चर्चाओं और पार्टी सूत्रों के हवाले से कई कारण सामने आ रहे हैं. इनमें 2023 की हार, स्थानीय स्तर पर एंटी-इन्कम्बेंसी, संगठन का आंतरिक फीडबैक, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और नए सामाजिक समीकरणों पर दांव जैसे पहलुओं की चर्चा है. इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। 

आशुतोष तिवारी को अपेक्षाकृत नया चेहरा माना जाता है. माना जा रहा है कि पार्टी इस चुनाव में सिर्फ उम्मीदवार नहीं बदल रही, बल्कि यह संदेश भी देना चाहती है कि अब जीत की संभावना, स्थानीय स्वीकार्यता और संगठन की रणनीति वरिष्ठता से अधिक महत्वपूर्ण होगी. हालांकि टिकट बदलते ही दतिया में विरोध भी सामने आया. नरोत्तम मिश्रा समर्थकों ने प्रदर्शन किए, झांसी-ग्वालियर हाईवे पर जाम लगाया और संगठन के कुछ पदाधिकारियों के इस्तीफे की खबरें भी सामने आईं। 

ओबीसी मतदाता चुनाव में निभाते हैं अहम भूमिका
यह संकेत है कि चुनौती अब सिर्फ कांग्रेस से मुकाबले की नहीं, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की भी है. दतिया विधानसभा में करीब ढाई लाख मतदाता हैं. अनुसूचित जाति, ब्राह्मण, कुशवाह, यादव, ठाकुर, वैश्य और अन्य ओबीसी वर्ग चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी इस बार इन्हीं सामाजिक समीकरणों को नए तरीके से साधने की कोशिश कर रही है। 

दूसरी ओर कांग्रेस इसे बीजेपी की अंदरूनी असहमति बताकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में है. वहीं आजाद समाज पार्टी की मौजूदगी मुकाबले को और रोचक बना सकती है. एक समय था जब दतिया में चुनाव का मतलब नरोत्तम मिश्रा माना जाता था. लेकिन इस उपचुनाव ने यह संदेश जरूर दिया है कि राजनीति में कोई सीट किसी एक नेता की स्थायी जागीर नहीं होती. चुनावी राजनीति में अंतिम फैसला संगठन का होता है और संगठन का पहला पैमाना जीत होता है। 

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बीजेपी के लिए चुनैती बनी दतिया सीट
दतिया का उपचुनाव अब सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं है. यह चुनाव इस बात की भी परीक्षा है कि क्या बीजेपी का नया प्रयोग सफल होगा? क्या नरोत्तम मिश्रा अपने समर्थकों के साथ पूरी ताकत से पार्टी के लिए प्रचार करेंगे और क्या ग्वालियर-चंबल की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन का नया अध्याय शुरू हो चुका है. इन सभी सवालों के जवाब अब 30 जुलाई के मतदान और 3 अगस्त को आने वाले नतीजों में मिलेंगे। 

दतिया क्यों है हाई-प्रोफाइल सीट?
वर्षों तक नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक गढ़. 2008, 2013 और 2018 में लगातार विधायक बने. शिवराज सरकार में गृह मंत्री समेत कई अहम विभाग संभाले. 2023 में कांग्रेस के राजेंद्र भारती से चुनाव हार गए. कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की विधानसभा सदस्यता समाप्त होने से सीट रिक्त हुई है. जिसके लिए 30 जुलाई को मतदान और 3 अगस्त को मतगणना होगी। 

आशुतोष तिवारी पर दांव क्यों?
अपेक्षाकृत नया चेहरा और संगठन में सक्रिय भूमिका है. ब्राह्मण वोट बैंक को साधने की रणनीति है. सोशल इंजीनियरिंग के जरिए नया नेतृत्व तैयार करने की कोशिश भी है. दतिया में करीब 2.40 लाख मतदाता हैं. जिननें अनुसूचित जाति : 58–60 हजार, ब्राह्मण : 33–35 हजार, जाटव-अहिरवार : 33–40 हजार,  कुशवाह : 28–30 हजार, यादव : 14–18 हजार, ठाकुर : 14–18 हजार, वैश्य : 12–15 हजार,  मुस्लिम : 7–8 हजार, अन्य ओबीसी : 15–20 हजार हैं। 

2023 से ब्राह्मण, वैश्य और कुशवाह वोटों में बिखराव की चर्चा है. ऐसे में बीजेपी में इस बार सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश है. स्थानीय संगठन को ज्यादा महत्व दिया गया है. लेकिन बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नरोत्तम समर्थकों की नाराजगी है. ऐसे में कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। 

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तो क्या इसलिए भी कट गया नरोत्तम मिश्रा का टिकट?
बताया जा रहा है कि दिल्ली स्तर पर कराए गए सर्वे में उनकी स्थिति उम्मीद के मुताबिक मजबूत नहीं पाई गई. सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय नेतृत्व ने केवल उम्मीदवार की लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि स्थानीय संगठन और भविष्य की राजनीतिक स्वीकार्यता का भी आकलन कराया और आशुतोष तिवारी को टिकट दिया गया। 

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, टिकट बदलने के पीछे केवल चुनावी गणित नहीं बल्कि सत्ता संतुलन भी बड़ी वजह हो सकता है. डॉ. नरोत्तम मिश्रा यदि उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचते तो उनके मंत्री बनने और महत्वपूर्ण विभाग मिलने की संभावनाएं थी. ज़ाहिर है कि इससे बीजेपी और सरकार में एक नया शक्ति केंद्र बनता. वहीं एमपी बीजेपी में पहले से सीएम मोहन यादव के अलावा शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह और नरेंद्र सिंह तोमर जैसे कई शक्ति केंद्र हैं।  

ऐसे में माना जा रहा है कि बीजेपी आलाकमान किसी नए शक्ति केंद्र के बनने से बच रहा था और इसी रणनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए आशुतोष तिवारी को टिकट दिया जो संभागीय संगठन प्रभारी रह चुके हैं. शायद यही वजह है कि बीजेपी ने एक ब्राह्मण नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर दूसरे ब्राह्मण आशुतोष तिवारी को टिकट दिया है. इससे जातिगत और सामाजिक संतुलन यथावत रहेगा। 

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