मध्य प्रदेश

डॉ. मोहन यादव: सहजता, स्पष्टता और संघर्ष से गढ़ा एक नेतृत्व

By Admin|24 Mar 2026, 11:06 PM
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भोपाल 

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मध्यप्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को अपने यशस्वी जीवन के 62वें जन्म दिवस पर पूरे प्रदेश से कोटि कोटि बधाईयां और शुभकामनाएं मिल रही हैं यह स्वाभाविक भी है इसलिए इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है क्योंकि उन्हें अपने जन्म दिवस पर जितनी शुभकामनाएं और बधाईयां मिल रही हैं। वे उससे कहीं अधिक के हकदार हैं उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में अपने प्रथम कार्यकाल के आधे से भी कम समय में जो शानदार लोकप्रियता अर्जित की है उसने सत्ता और संगठन के उस वर्ग को भी आश्चर्यचकित कर दिया है जो दिसम्बर 2023 में उन्हें मुख्यमंत्री पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपे जाने पर यह धारणा बना चुका था कि उन्हें मध्यप्रदेश के 19 वें मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपने का जो फैसला पार्टी हाई कमान ने किया है वह अपने आप में किसी बहुत बड़े जोखिम से कम नहीं है परन्तु मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभालते ही मोहन यादव ने अपने साहसिक फैसलो से यह साबित कर दिया कि प्रदेश के बहुमुखी विकास की नयी इबारत लिखने के संकल्प की पूर्ति के लिए वे बड़े से बड़ा जोखिम लेने के लिए तैयार हैं। उनकी इस कार्य शैली ने उन्हें चंद महीनों में ही पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व का चहेता मुख्यमंत्री बना दिया। मुख्यमंत्री यादव के ताबड़तोड़ फैसलों का यह सिलसिला आज भी अबाध गति से जारी है। मोहन यादव किसी अधिकारी को नहीं बख्शते चाहे वह कितने भी बडे पद पर क्यों न हो। जन हित से जुड़ी महत्वपूर्ण योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही या सुस्ती वे कभी बर्दाश्त नहीं करते। भ्रष्टाचार से उन्हें सख्त नफ़रत है और ऐसे किसी भी मामले की जानकारी उनके संज्ञान में आते ही मुख्यमंत्री का कठोर फैसला आने में चंद घंटे भी नहीं लगते।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का जन्मदिन मेरे लिए केवल एक औपचारिक अवसर नहीं, बल्कि उन स्मृतियों को याद करने का समय भी है, जो उनके राजनीतिक सफर के साथ जुड़ी रही हैं। एक मित्र और पत्रकार के रूप में मैंने उन्हें न केवल मंचों पर, बल्कि बेहद सामान्य और अनौपचारिक परिस्थितियों में भी करीब से देखा है।

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मेरी उनसे पहली मुलाकात उस समय हुई, जब वे उज्जैन विकास प्राधिकरण के चेयरमैन बने थे। स्थान था—भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा जी का निवास। वह मुलाकात एक औपचारिक परिचय से शुरू हुई, लेकिन समय के साथ यह संवाद निरंतर बढ़ता गया।

हम भाजपा के पूर्व संगठन महामंत्री अरविंद मेनन जी के कार्यालय में भी बैठकर लंबी चर्चा होती थी|

उज्जैन के मेरे कुछ पत्रकार साथी मोहन जी के बेहद करीब थे, और उसी कारण मेरी भी उनसे निकटता बनी। बाद में जब वे पर्यटन विकास निगम के चेयरमैन बने, तब भी यह संपर्क और संवाद बना रहा। उस दौर में एक बात जो हमेशा स्पष्ट दिखती थी—वे केवल पद के नेता नहीं, बल्कि विचार और संवाद के व्यक्ति हैं।

मोहन यादव एक प्रभावशाली वक्ता हैं। विभिन्न न्यूज़ चैनलों की डिबेट में वे पार्टी का पक्ष मजबूती से रखते थे। कई बार ऐसा होता था कि वे पार्टी का प्रतिनिधित्व करते थे और मैं विशेषज्ञ के तौर पर उसी चर्चा का हिस्सा होता था। डिबेट खत्म होने के बाद जो अनौपचारिक संवाद होता था, वही असली पहचान बनाता था।

मुझे आज भी याद है—हमारे बड़े भाई रिजवान अहमद सिद्दीकी, जो न्यूज़ वर्ल्ड से जुड़े थे, डिबेट के बाद हम सबको काहवा पिलाते थे। उसी दौरान संघ, संगठन और समसामयिक विषयों पर घंटों चर्चा होती थी। उन चर्चाओं में मोहन जी का दृष्टिकोण हमेशा स्पष्ट, तार्किक और संतुलित रहता था।

मैंने उनके कई साक्षात्कार भी किए हैं। हर बार एक बात समान रही—उनकी सहजता और सरलता। आज जब वे मुख्यमंत्री हैं, तब भी उनके व्यवहार में कोई कृत्रिमता नहीं दिखती। वे आज भी एक आम व्यक्ति की तरह संवाद करते हैं, न कि केवल एक औपचारिक राजनेता की तरह।

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हाल के वर्षों में उनके नेतृत्व का एक आक्रामक पक्ष सामने आया है—प्रशासनिक सख्ती और त्वरित निर्णय। उनके फैसलों ने उन्हें एक जन-नेता के रूप में स्थापित किया है। लेकिन एक मित्र के तौर पर यह कहना भी जरूरी है कि यह सफर अभी अधूरा है।

मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि मुख्यमंत्री बनने के दो वर्षों बाद भी उनमें राजनीतिक दुर्गुण नहीं आए हैं। वे आज भी स्पष्टवादी हैं, निर्णय लेने में संकोच नहीं करते। लेकिन एक महत्वपूर्ण कमी जो महसूस होती है, वह है—एक मजबूत सलाहकार टीम का अभाव।

किसी भी बड़े नेता के लिए केवल व्यक्तिगत क्षमता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि एक सशक्त और अनुभवी सलाहकारों की टीम भी उतनी ही जरूरी होती है। यदि यह कमी दूर हो जाए, तो उनके निर्णय और भी प्रभावी और दूरगामी हो सकते हैं।

यह निर्विवाद है कि अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने कई ऐसे निर्णय लिए हैं, जिन्होंने उन्हें जनता के बीच एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया है। लेकिन उनकी मंजिल केवल यहीं तक सीमित नहीं है—अभी उनका सफर लंबा है।

मैंने उन्हें करीब से देखा है—एक कार्यकर्ता, एक वक्ता, एक संवादकर्ता और अब एक मुख्यमंत्री के रूप में।

उनकी सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे बदलते नहीं हैं—पद बदलता है, लेकिन व्यक्ति वही रहता है।

उनके जन्मदिन पर एक मित्र के तौर पर मेरी यही शुभकामना है कि वे अपनी इसी सरलता, स्पष्टता और प्रतिबद्धता को बनाए रखते हुए मध्यप्रदेश को एक नई दिशा दें।

सफ़र अभी बाकी है, ये मुकाम आख़िरी नहीं,

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जो थाम ले इरादे, उसके लिए कोई राह मुश्किल नहीं।

ज़मीन से जुड़े रहो तो आसमान भी झुकता है,

जो बदलने निकले वक़्त को, वो खुद भी रुकता नहीं।

 

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