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शिक्षा और संस्कृति का संगम: हनुमान चालीसा व सुंदरकांड अब हिंदी सिलेबस का हिस्सा

By Admin|27 Jun 2026, 4:38 PM
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 बलरामपुर
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में स्थित मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय ने एक ऐतिहासिक और साहसिक शैक्षणिक कदम उठाते हुए अपने हिंदी पाठ्यक्रम में हनुमान चालीसा और सुंदरकांड को शामिल कर लिया है। यह निर्णय न केवल बलरामपुर, बल्कि पूरे देश की शिक्षा जगत में चर्चा का विषय बन गया है। 174 महाविद्यालयों के छात्रों पर पड़ेगा सीधा प्रभाव

छात्रों पर प्रभाव
देवी पाटन मंडल के अंतर्गत आने वाले 174 महाविद्यालयों के हजारों विद्यार्थी अब हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम के तहत इन पवित्र और काव्यात्मक रचनाओं का अध्ययन करेंगे। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि यह बदलाव शिक्षा को संस्कृति, आध्यात्म और स्थानीय परंपरा से जोड़ने की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल है।

बलरामपुर के तुलसीदास की है यह रचना, विश्वविद्यालय का दावा
विश्वविद्यालय ने एक महत्वपूर्ण तथ्य को भी सामने रखा है जो अब तक व्यापक रूप से चर्चित नहीं था। विश्वविद्यालय के अनुसार, हनुमान चालीसा की यह विशेष रचना गोस्वामी तुलसीदास (काशी) की नहीं, बल्कि बलरामपुर के तुलसीपुर क्षेत्र के भोजपुर निवासी संत तुलसीदास की है, जिन्होंने इसे इसी पवित्र आध्यात्मिक भूमि पर अपने साधना काल में रचा था।

प्रोफेसर शैलेंद्र नाथ मिश्र के अनुसार, ये संत तुलसीदास स्वयं को गोस्वामी तुलसीदास का अवतार मानते थे। इस तथ्य का उल्लेख 1940 के दशक में प्रकाशित कल्याण पत्रिका में विनायक के लेख में मिलता है। इसके अलावा अखिल भारतीय

विक्रम परिषद, काशी द्वारा प्रकाशित तुलसी ग्रंथावली में भी इसकी पुष्टि की गई है। बाद में ये संत भवनियापुर में बस गए और तुलसीपुर नगर की स्थापना की।

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कक्षावार पाठ्यक्रम में क्या-क्या बदला
बीए प्रथम वर्ष के हिंदी पाठ्यक्रम में अब अयोध्याकांड (दोहा 28 से 41) और रामलला नहछू शामिल की गई हैं। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा गोंडा क्षेत्र की अवधी बोली में रचित यह बाललीला काव्य है, जिसमें बालक राम के स्नेहपूर्ण बाल स्वरूप का जीवंत और मनोरम चित्रण है। विश्वविद्यालय स्तर पर यह पहला अवसर है जब स्थानीय अवधी रूप को इस तरह औपचारिक सम्मान दिया गया है।

विश्वविद्यालय ने पहली बार हनुमान चालीसा को स्नातक पाठ्यक्रम में शामिल किया है। यह रचना न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से, बल्कि काव्य-सौंदर्य, भाषा-शक्ति और भक्ति भाव की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है। एमए प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में सुंदरकांड को जोड़ा गया है, जिससे छात्रों को तुलसीदास के काव्य कौशल, भाषा-सौंदर्य और भक्ति दर्शन की गहराई समझने का अवसर मिलेगा।

कुलपति का दृष्टिकोण
मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रविशंकर सिंह ने कहा कि हमारा उद्देश्य शिक्षा को अपनी संस्कृति से जोड़ना है। जब विद्यार्थी अपनी भाषा और परंपरा को जानेंगे, तभी शिक्षा का वास्तविक अर्थ साकार होगा। उनके नेतृत्व में हिंदी विभाग के पाठ्यक्रम को स्थानीयता से वैश्विकता की दृष्टि से नया रूप दिया गया है। सितंबर 2025 में यह पाठ्यक्रम में शामिल करने की स्वीकृति दे दी गई थी। इस वर्ष से नए सत्र में पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।

विश्वविद्यालय वित्त समिति के सदस्य सर्वेश सिंह ने कहा कि यह निर्णय केवल पाठ्यक्रम को समृद्ध नहीं करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश भी देगा कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही ज्ञान का वृक्ष फलता-फूलता है। हिंदी पाठ्यक्रम समिति के पूर्व संयोजक प्रो. शैलेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि आधुनिक शिक्षा तभी पूर्ण है, जब उसमें संस्कृति, लोकभाषा और आध्यात्मिक चेतना का समावेश हो।

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