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शहद नहीं, जंगल बचाने का काम भी करते हैं स्लॉथ भालू; वैज्ञानिकों ने बताया कैसे

By Admin|06 Jun 2026, 1:21 PM
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अरावली

जब हम भालू (Sloth Bear) के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में शहद चाटते या सुस्त पड़े जानवर की छवि आती है. लेकिन राजस्थान के सूखे और झीलों से घिरे अरावली के जंगलों (Aravalli Range) में ये भालू एक माली की तरह काम कर रहे हैं. हाल ही में आई एक साइंटिफिक रिसर्च से पता चला है कि भालू जो फल खाते हैं, उनके बीज जब भालू के पेट से होकर बाहर निकलते हैं, तो उनसे नए पौधे बहुत तेजी से उगते हैं. आसान शब्दों में कहें तो भालू अपनी इस आदत से अरावली के जंगलों को नया जीवन दे रहे हैं और पेड़-पौधों की आबादी बढ़ाने में मदद कर रहे हैं.

यह रिसर्च किसने की है?
इस दिलचस्प स्टडी का नाम Seasonal Diet And Seed Dispersal By Sloth Bears Melursus Ursinus in Western India है, जिसे जल्द ही इंटरनेशनल जर्नल Biotropica में पब्लिश किया जाना मंजूर कर लिया गया है. इस रिसर्च को तीन वैज्ञानिकों की टीम ने मिलकर पूरा किया है. इनमें रिसर्च स्कॉलर उत्कर्ष प्रजापति, इंडिपेंडेंट रिसर्चर डॉ. के.एस. गोपी सुंदर और उदयपुर की एक यूनिवर्सिटी के रिसर्चर विजय कुमार कोली शामिल हैं. उत्कर्ष ने अपनी पीएचडी की जरूरतों के तहत यह स्टडी की है. इन वैज्ञानिकों का कहना है कि अरावली जैसे सूखे और पतझड़ वाले जंगलों में बड़े सर्वाहारी (सब कुछ खाने वाले) जानवर पेड़-पौधों की पीढ़ियों को आगे बढ़ाने में कैसे मदद करते हैं, इस पर अतीत में बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी.

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वैज्ञानिकों ने कैसे लगाया इस सच का पता?
यह अहम स्टडी अरावली के अर्ध-शुष्क पतझड़ वाले जंगलों में की गई. वैज्ञानिकों ने भालू के खान-पान और बीजों को दूर-दूर तक फैलाने के तरीके को गहराई से समझने के लिए एक अनोखा रास्ता चुना. उन्होंने सर्दियों और गर्मियों के मौसम में भालू के मल (Scat) के सैंपल इकट्ठे किए और उनका एनालिसिस किया. इसके बाद उन्होंने भालू के मल से निकले बीजों और सीधे पौधों से तोड़े गए बीजों को अलग-अलग उगाकर उन पर एक्सपेरिमेंट किए. इस पूरी प्रक्रिया का मकसद यह जांचना था कि भालू के पेट से गुजरने के बाद कौन से बीज ज्यादा बेहतर अंकुरित होते हैं और किस पौधे के सीडलिंग्स ज्यादा समय तक जिंदा रहकर पेड़ बन पाते हैं.

भालू के पेट से गुजरने के बाद बीजों में क्या बदलाव आया?
इस रिसर्च में 6 अलग-अलग पौधों की प्रजातियों के बीज भालू के पेट से गुजरने के बाद भी पूरी तरह सुरक्षित और उगने लायक पाए गए. कुछ पौधों पर तो इसका असर बेहद चौंकाने वाला था. रिसर्च में देखा गया कि लैंटाना कैमारा नाम की एक विदेशी आक्रामक झाड़ी के बीज सिर्फ और सिर्फ तभी अंकुरित हुए, जब वे भालू के मल से होकर निकले थे. इसके विपरीत डोंकी बेरी (Grewia flavescens) के मामले में सीधे पेड़ से तोड़े गए बीज ज्यादा बेहतर तरीके से जिंदा रहे. वहीं, कोरोमंडल एबनी या तेंदू (Diospyros melanoxylon) के बीज जब भालू के पेट से होकर बाहर आए, तो उनसे उगे पौधे सामान्य बीजों के मुकाबले बहुत ज्यादा दिनों तक जिंदा रहे और मजबूत निकले. बाकी चार प्रजातियों के पौधों में भालू के मल से निकले बीज और सामान्य बीजों के उगने और जिंदा रहने की रफ्तार लगभग एक जैसी ही देखी गई.

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मौसम के हिसाब से बदल जाता है भालुओं का 'मेन्यू'
रिसर्च से एक और दिलचस्प बात सामने आई कि अरावली के भालू मौसम के हिसाब से अपने खाने की थाली पूरी तरह बदल लेते हैं. इसे साइंस की भाषा में डाइट्री प्लास्टिसिटी कहते हैं. सर्दियों के मौसम के दौरान भालू जमकर फल खाते हैं और खास बात यह है कि वे अंधाधुंध हर तरह के फल नहीं खाते, बल्कि अपनी पसंद के चुनिंदा फल ही चुनते हैं. वहीं, गर्मियों में जब जंगलों में फल कम हो जाते हैं, तो भालू अपना मेन्यू बदलकर कीड़े-मकोड़े और दीमक खाने लगते हैं. हालांकि भालुओं का शरीर मुख्य रूप से चींटियां और दीमक खाने के लिए ही कुदरत ने बनाया है, लेकिन वे अपनी इस आदत में बदलाव कर लेते हैं और मौका मिलते ही फल खाने से पीछे नहीं हटते.

अरावली के पर्यावरण के लिए क्यों जरूरी है भालू?
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) ने भालू (Sloth Bear) को Vulnerable यानी खतरे की कगार पर खड़ी प्रजातियों की लिस्ट में रखा है. यह प्रजाति मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में ही पाई जाती है. डॉ. के.एस. गोपी सुंदर ने आईएएनएस को बताया कि यह रिसर्च साबित करती है कि भालू चुनिंदा बीजों को फैलाने का बहुत बड़ा जरिया हैं. मौसम के हिसाब से बदलने वाली ऐसी जगहों पर, जहां पानी और संसाधनों की भारी कमी होती है, वहां भालुओं का यह लचीलापन पूरे जंगल की बनावट और हरियाली को तय करता है. इससे पहले भारत में हुए रिसर्च सिर्फ इस बात तक सीमित थे कि भालू क्या खाते हैं, लेकिन इस नई स्टडी ने पहली बार एक्सपेरिमेंट के जरिए यह साबित किया है कि भालू अरावली के इकोसिस्टम को जिंदा रखने और यहां की वनस्पति को संवारने में कितने बड़े और अहम मददगार हैं.

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